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दर्पण में दरार

दर्पण में जब दरार पड़ जाती है
तो मेरा अक्स भी टूट जाता है
यह दरार नई नहीं , इसे जानना चाहिए
बल्कि रिश्तों में और दिलों में आई दरार का प्रतीक है
जब दर्पण टूटता है तो, छवि खंडित हो जाती है
मानव की टूटी हुई भावनाओं और बिखरे हुए जीवन को दर्शाती है
यह हमें सोचने पर मजबूर कर देती है
की क्या हम अपनी दरारों को, यानी गलतियों को छिपा रहे हैं या उन्हें स्वीकार कर रहे हैं
रिश्तो में और दिलों में दरार आ जाती है
तो लोग कहते हैं कि दर्पण बदल दो
मैं कहती हूं कि स्वयं को देखो
दरार दर्पण में नहीं होती
वो तो दिल में होती है
दरारें हमारे दिल में सदा रहती है
पर ये दरारें बुरी नहीं होती
इसी से रोशनी अंदर है आती
जब दर्पण टूटता है तो ही समझ में आता है
की साबूत होने की कीमत क्या होती है
दर्पण में दरार रह जाने दो
यही मेरी जिंदगी की कहानी को पूरी करता है
कि मैं कब बिखरी और कैसे संभली
और फिर से खुशियों के संग जिंदगी चल पड़ती है

डॉ मीना कुमारी परिहार

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