
नौतपा की तपती दोपहरी,सूरज आग बरसाए रे।
धरती माँ की सूनी चूनर,गरमी से लहराए रे॥
पग-पग धूप बिछी है जैसे,सोने की कोई चादर हो।
दूर क्षितिज पर चमक रही,आशा की सुंदर गागर हो॥
नौतपा की तपती दोपहरी,सूरज आग बरसाए रे।
धरती माँ की सूनी चूनर,गरमी से लहराए रे॥
पीपल, बरगद, नीम की छाया,सबको पास बुलाती है।
थके मुसाफिर के चेहरे पर,ठंडी मुस्कान सजाती है॥
तपकर खेत सँवरते आगे,मेघों का संदेशा लाते।
नौतपा के कठिन दिनों से,सावन के सपने मुस्काते॥
नौतपा कहता धीरे-धीरे,हिम्मत कभी न हारो तुम।
तप के बाद ही बरसे खुशियाँ,जीवन में उजियारे तुम॥
नौतपा की तपती दोपहरी,सूरज आग बरसाए रे।
धरती माँ की सूनी चूनर,गरमी से लहराए रे॥
रीना पटले शिक्षिका
शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश













