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श्रम-सुंदरी

लाल परिधान में सजी श्रम-सुंदरी,
लाल चूड़ियों की मधुर खनक लिए,
कानों में झिलमिल करते कुण्डल,
जीवन संघर्ष को खूबसूरती से जिए।

सिर पर हरे चारे का गट्ठर धारे,
धरती की हरियाली को घर ले जाती,
एक हाथ में हँसिया दृढ़ता से थामे,
श्रम की महिमा का पाठ पढ़ाती।

एक कंधे पर लंबी वेणी झूल रही,
मानो काली नागिन लहराती हो,
तेज़ कदमों से पथ नापती वह,
कर्तव्य की ओर बढ़ती जाती हो।

धूप ने तन को भले तपाया हो,
पर मन का तेज़ अडिग और उज्ज्वल है,
जग जिसे साधारण समझे शायद,
वह श्रम-शक्ति का अनुपम संबल है।

उसके माथे का पसीना मोती-सा,
त्याग और तपस्या की पहचान है,
उसकी मेहनत से ही परिवार में
सुख-समृद्धि का मधुर विहान है।

नहीं रूप का उसे अभिमान कोई,
न आभूषणों का मोह सताता है,
श्रम ही उसका सच्चा श्रृंगार,
यही उसके जीवन को महकाता है।

खेतों से घर की ओर लौटती वह,
साहस का सजीव उदाहरण लगती है,
धरती की बेटी, अन्नपूर्णा बन,
हर पीड़ा को हँसकर सहती है।

वह श्रम-सुंदरी सिखलाती है—
जीवन का वास्तविक सौंदर्य क्या है;
रूप क्षणिक है, श्रम अमर है,
यही मानवता की सच्ची व्याख्या है।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा’ सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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