
जवानी आकर चली गई
जर्जर काया बना गई
दुविधा सुविधा के झूले में
ईंर्ष्या द्वैष की आग जला
तन बदन को झुलसा गई
तपन डाह मन मे फैला गई
हमने तिनका तिनका जोडा
अहंकार का महल बनाया
खुद को सर्वेसर्वा समझा
चलने फिरने से लाचार कर गई
जवानी आकर कब चली गई
डगमग कदम चलना सिखा गई
यौवन को ठेंगा दिखा गई।
गोवर्धन थपलियाल दिल्ली












