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भीड़ में भी मन अकेला

आज आपाधापी की जिंदगी में
सभी दौड़ लगा रहे हैं
सच ,ये कैसा है जीवन
आज नहीं किसी को फुर्सत
एक दूसरे से बात करने की हर आदमी अपने को बिजी समझ रहा है
आखिर अपने दिल की बात, मन की वेदना किससे कहें
सोशल मीडिया ने भीड़ में भी
मन को अकेला कर दिया है
एक ही घर में रहकर किसी से बात नहीं, ना ही किसी को कोई खबर
कितने ही लोग हैं हमारे साथ
फिर भी मन है अकेला
कितने ही रिश्ते हैं ,जाने- पहचाने
चेहरे हैं
पर कोई नहीं अपना प्रतीत होता है
सबके साथ हैं, पर कोई नहीं है साथ
हम सबके लिए हैं, पर कोई नहीं अपना
यह जीवन सुख दुख का मेला है
इस रंग मंच पर सभी आते-जाते रहते हैं
हम अपने ख्वाबों -ख्यालों में खोए रहते हैं
विचारों का हलचल मन मस्तिष्क में चलता रहता है
यह मन भीड़ में भी है अकेला
महसूस करने को कभी-कभी मजबूर कर देता है

डॉ मीना कुमारी परिहार

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