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शून्य : पूर्णता, अनन्त और मानव जीवन का शाश्वत रहस्य

1. प्रस्तावना

“शून्य वह नहीं जिसमें कुछ भी नहीं है; शून्य वह है जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि के जन्म की सम्भावना निहित है।”

मानव सभ्यता के इतिहास में अनेक आविष्कार हुए, अनेक विचार जन्मे और अनेक सिद्धान्तों ने समय की दिशा बदली; किन्तु यदि किसी एक खोज ने ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और मानव जीवन को एक सूत्र में बाँधा है, तो वह “0” (शून्य) है। देखने में साधारण, पर अर्थ में असाधारण। शून्य केवल गणित का अंक नहीं, बल्कि अस्तित्व का मौन रहस्य है। इसी ने गणना को गति दी, विज्ञान को विस्तार दिया, तकनीक को आधार दिया और भारतीय दर्शन को एक अद्वितीय गहराई प्रदान की। भारत ने विश्व को शून्य देकर केवल संख्याओं की एक नई भाषा नहीं दी, बल्कि यह भी सिखाया कि जहाँ मनुष्य को रिक्तता दिखाई देती है, वहीं से सृजन का प्रथम प्रकाश फूटता है।

शून्य हमें स्मरण कराता है कि प्रत्येक महान उपलब्धि का आरम्भ एक साधारण बिन्दु से होता है और प्रत्येक पूर्णता का आधार विनम्रता, धैर्य और निरन्तर साधना है। इसलिए शून्य को समझना केवल गणित को समझना नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और आत्मा के उस शाश्वत सत्य को जानना है, जहाँ सीमित का विस्तार असीम में और व्यक्ति का विलय परम चेतना में होता है।

2. भूमिका

“जीवन का सबसे बड़ा गणित यह नहीं कि हमने कितना पाया, बल्कि यह है कि स्वयं को कितना निखारा।”

क्या कभी हमने विचार किया है कि जो अंक स्वयं कोई मूल्य नहीं रखता, वही अन्य अंकों का मूल्य अनेक गुना कैसे बढ़ा देता है? यही शून्य का अद्भुत रहस्य है और यही मानव जीवन का भी। मनुष्य जब इस संसार में जन्म लेता है, तब उसके पास न धन होता है, न पद, न प्रतिष्ठा और न कोई विशेष पहचान; वह जीवन की दृष्टि से मानो एक शून्य होता है। किन्तु उसी शून्य में ज्ञान का प्रकाश, चरित्र की ऊँचाई, सेवा की भावना और आत्मविकास की अनन्त सम्भावनाएँ छिपी होती हैं। संस्कार उसे दिशा देते हैं, शिक्षा उसे विवेक देती है, कर्म उसे पहचान देता है और साधना उसे आत्मबोध तक पहुँचाती है। यही कारण है कि शून्य जीवन का अत्यन्त प्रेरक प्रतीक बन जाता है। यह हमें बताता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रारम्भ से नहीं, बल्कि अपने सतत प्रयासों, श्रेष्ठ विचारों और कर्मों से पहचाना जाता है। परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, निरन्तर सीखने, आगे बढ़ने और स्वयं को बेहतर बनाने की इच्छा ही साधारण जीवन को असाधारण उपलब्धियों तक पहुँचाती है।

3. शून्य का उद्भव और इतिहास

“जब मानव ने शून्य को समझा, तभी उसने अनन्त की गणना करने का साहस किया।”

मानव सभ्यता के इतिहास में शून्य (0) की खोज केवल एक गणितीय उपलब्धि नहीं, बल्कि ज्ञान-विज्ञान के विकास की सबसे महान क्रान्तियों में से एक है। विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताओं ने संख्याओं का प्रयोग अवश्य किया, किन्तु शून्य को स्वतंत्र संख्या और स्थानमान (Place Value) के आधार के रूप में विकसित करने का श्रेय भारत को प्राप्त है। भारतीय वैदिक एवं दार्शनिक परम्परा में शून्य का भाव गणित से बहुत पहले अस्तित्व में था। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि के पूर्व की अव्यक्त अवस्था का वर्णन और उपनिषदों में वर्णित ‘पूर्ण’ का सिद्धान्त इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि भारतीय चिंतन ने रिक्तता को भी अनन्त सृजन की सम्भावना के रूप में देखा।

भारतीय गणितज्ञों ने इस दार्शनिक विचार को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया। पाँचवीं शताब्दी में आचार्य आर्यभट्ट जी ने दशमलव स्थानमान प्रणाली को व्यवस्थित रूप दिया, जबकि सातवीं शताब्दी में आचार्य ब्रह्मगुप्त जी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त’ में पहली बार शून्य को स्वतंत्र संख्या मानकर उसके साथ जोड़, घटाव और अन्य गणितीय क्रियाओं के नियम स्पष्ट किए। बाद में भास्कराचार्य जी सहित अनेक भारतीय विद्वानों ने इस ज्ञान को और समृद्ध किया। बख्शाली पाण्डुलिपि में प्राप्त शून्य का चिन्ह यह प्रमाणित करता है कि भारत में इसका प्रयोग अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित था। यह ज्ञान अरब विद्वानों के माध्यम से पश्चिमी एशिया और यूरोप पहुँचा, जहाँ से आधुनिक गणित, बीजगणित, कलन (Calculus), खगोलशास्त्र और अभियंत्रिकी का अभूतपूर्व विकास सम्भव हुआ।

आज का डिजिटल युग और वैश्विक अर्थव्यवस्था सभी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शून्य पर आधारित हैं। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि यदि भारत ने विश्व को शून्य न दिया होता, तो आधुनिक विज्ञान और तकनीकी सभ्यता का वर्तमान स्वरूप संभव नहीं होता। शून्य भारत की वह अमर बौद्धिक धरोहर है जिसने केवल संख्याओं को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता की दिशा और गति को बदल दिया। यही कारण है कि शून्य एक अंक से कहीं अधिक भारतीय ज्ञान, दूरदर्शिता और विश्वकल्याण की अमूल्य विरासत है।

4. गणित और विज्ञान में शून्य

“जहाँ शून्य नहीं, वहाँ गणना नहीं; जहाँ गणना नहीं, वहाँ विज्ञान नहीं और जहाँ विज्ञान नहीं, वहाँ आधुनिक सभ्यता की कल्पना भी नहीं।”

यदि मानव इतिहास से शून्य को हटा दिया जाए, तो आधुनिक गणित और विज्ञान का सम्पूर्ण ढाँचा ही ढह जाएगा। संख्या-पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता उसका दशमलव स्थानमान (Decimal Place Value System) है और इस व्यवस्था की आत्मा शून्य है। किसी अंक का महत्व केवल उसके स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके स्थान से निर्धारित होता है और इस स्थान को अर्थ प्रदान करने का कार्य शून्य करता है। इसी कारण 1, 10, 100 और 1000 जैसी संख्याएँ अपना विशिष्ट मूल्य प्राप्त करती हैं। यही व्यवस्था लाखों, करोड़ों और उससे भी बड़ी संख्याओं की गणना को सरल, सटीक और व्यवस्थित बनाती है। भारतीय गणित की यह अद्भुत देन आज सम्पूर्ण विश्व की वैज्ञानिक, आर्थिक और तकनीकी प्रणालियों का आधार है। वास्तव में शून्य स्वयं मौन रहकर दूसरों का मूल्य बढ़ा देता है; यही कारण है कि उसे ‘गणित का मौन नायक’ कहा जा सकता है। जीवन भी यही शिक्षा देता है कि जो व्यक्ति स्वयं विनम्र रहता है, वही दूसरों के विकास का आधार बनता है।

आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रत्येक उपलब्धि में शून्य की अदृश्य उपस्थिति विद्यमान है। कंप्यूटर, इंटरनेट, स्मार्टफोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, बैंकिंग, GPS, उपग्रह संचार और अंतरिक्ष अनुसंधान इन सभी का मूल आधार बाइनरी प्रणाली (0 और 1) है। कंप्यूटर की भाषा में 0 विद्युत संकेत की अनुपस्थिति (OFF) और 1 उसकी उपस्थिति (ON) का प्रतीक है। इन्हीं दो संकेतों के असंख्य संयोजन से आज का सम्पूर्ण डिजिटल संसार संचालित हो रहा है। विज्ञान में परम शून्य ताप (Absolute Zero) पदार्थ के व्यवहार को समझने का आधार है, जबकि गणित में मूल बिन्दु (Origin) प्रत्येक मापन और निर्देशांक प्रणाली का प्रारम्भिक केन्द्र है। खगोलशास्त्र में ग्रहों की गति, आकाशगंगाओं की दूरी और ब्रह्माण्ड के विस्तार की गणना भी शून्य पर आधारित गणित के बिना सम्भव नहीं है।

5. भारतीय दर्शन में शून्य

“पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है और पूर्ण में ही सब कुछ पुनः समाहित हो जाता है; यही शून्य का शाश्वत रहस्य है।”

भारतीय दर्शन में शून्य का अर्थ कभी भी रिक्तता, नकारात्मकता या अस्तित्वहीनता नहीं रहा, बल्कि वह अनन्त चेतना, परम सत्य और अखण्ड पूर्णता का प्रतीक है। वैदिक ऋषियों ने सृष्टि के रहस्यों का चिंतन करते हुए उस अव्यक्त अवस्था का वर्णन किया, जहाँ से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का उद्भव होता है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि के पूर्व की मौन एवं अव्यक्त स्थिति का उल्लेख मिलता है, जबकि ईशावास्य उपनिषद का अमर मंत्र— “पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥” यह उद्घोष करता है कि परम पूर्णता से अनन्त सृष्टि उत्पन्न होने पर भी वह पूर्ण ही बनी रहती है। यही भारतीय दर्शन का अद्वैत सिद्धान्त है, जहाँ शून्य और पूर्ण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही परम तत्व के दो परस्पर पूरक आयाम हैं। जहाँ सामान्य दृष्टि को रिक्तता दिखाई देती है, वहीं ज्ञान-दृष्टि को अनन्त सम्भावनाएँ और ब्रह्म का अखण्ड प्रकाश दिखाई देता है। इसलिए भारतीय चिंतन में शून्य अंत का नहीं, बल्कि सृष्टि, चेतना और आत्मबोध के अनन्त विस्तार का प्रतीक है।

भारतीय दर्शन की इसी गहन परम्परा ने शून्य को अस्तित्व और सृष्टि के मूल सिद्धान्त के रूप में स्वीकार किया। बौद्ध दर्शन में शून्यता का अर्थ प्रत्येक वस्तु की अनित्यता और परस्पर आश्रित अस्तित्व से है, जबकि वेदान्त में यही सत्य ब्रह्म की अखण्ड सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित होता है। सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष के भेद को स्पष्ट करता है, योग दर्शन मन की वृत्तियों के निरोध द्वारा आन्तरिक संतुलन स्थापित करता है और उपनिषद सम्पूर्ण जगत को एक ही चेतना की विविध अभिव्यक्ति मानते हैं। इस प्रकार भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराएँ अलग-अलग मार्ग अपनाते हुए भी इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि सत्य का अनुभव बाहरी संग्रह से नहीं, बल्कि अन्तर्दृष्टि, विवेक और अस्तित्व की एकात्मता के बोध से होता है। यही भारतीय चिंतन को विश्व के अन्य दार्शनिक दृष्टिकोणों से विशिष्ट बनाता है।

6. आध्यात्मिक जीवन में शून्य

“जो स्वयं को रिक्त कर लेता है, वही ईश्वर की अनन्त कृपा से भर जाता है।”

आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक आरम्भ बाहरी संसार को जीतने से नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार पर विजय प्राप्त करने से होता है। मनुष्य जीवनभर धन, पद, प्रतिष्ठा और अधिकार अर्जित करने का प्रयास करता है, किन्तु यदि इन उपलब्धियों के साथ अहंकार जुड़ जाए, तो वही उसके पतन का कारण बन जाता है। भारतीय संतों और ऋषियों ने इसलिए आत्मोन्नति का प्रथम सोपान ‘स्वयं को शून्य बनाना’ बताया है। इसका अर्थ स्वयं को तुच्छ समझना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अभिमान, लोभ, क्रोध, मोह और स्वार्थ को समाप्त करना है। जिस प्रकार रिक्त पात्र में ही अमृत भरा जा सकता है, बाँसुरी के भीतर का शून्य ही मधुर संगीत उत्पन्न करता है और आकाश की विशाल रिक्तता ही सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करती है, उसी प्रकार अहंकार से मुक्त हृदय में ही ज्ञान, प्रेम और ईश्वर का प्रकाश प्रकट होता है। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म शून्यता को पराजय नहीं, बल्कि आत्मविजय का प्रतीक मानता है। जब मनुष्य स्वयं को छोटा बनाना सीख लेता है, तभी वह जीवन के सबसे बड़े सत्य को जानने योग्य बनता है।

भारतीय आध्यात्मिक परम्परा यह मानती है कि आत्मोन्नति किसी बाहरी उपलब्धि का परिणाम नहीं, बल्कि आन्तरिक जागृति की प्रक्रिया है। ध्यान, जप, स्वाध्याय, सत्संग और आत्मचिन्तन मनुष्य के भीतर छिपी दिव्यता को प्रकट करने के साधन हैं। जब मन स्थिर होता है, विचार निर्मल होते हैं और जीवन में संयम स्थापित होता है, तब व्यक्ति परिस्थितियों का दास न रहकर उनका स्वामी बन जाता है। आध्यात्मिकता का वास्तविक उद्देश्य संसार से पलायन नहीं, बल्कि जीवन को अधिक जागरूक, संतुलित और अर्थपूर्ण बनाना है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में अध्यात्म को जीवन की सर्वोच्च विज्ञान-साधना कहा गया है।

7. मानव जीवन में शून्य का व्यावहारिक महत्व

“प्रत्येक महान वृक्ष कभी एक बीज था और प्रत्येक महान व्यक्तित्व कभी एक साधारण आरम्भ। यही शून्य का शाश्वत संदेश है।”

मानव जीवन का सम्पूर्ण प्रवाह शून्य से आरम्भ होकर पूर्णता की ओर बढ़ने वाली एक सतत यात्रा है। जन्म के समय प्रत्येक मनुष्य ज्ञान, धन, पद और प्रतिष्ठा की दृष्टि से शून्य होता है, किन्तु उसके भीतर अनन्त सम्भावनाओं का बीज विद्यमान रहता है। माता-पिता के संस्कार, गुरु का मार्गदर्शन, समाज का सहयोग और स्वयं का पुरुषार्थ उस बीज को विशाल वृक्ष का रूप प्रदान करते हैं। इसलिए महानता जन्म से नहीं, बल्कि चरित्र, कर्म और निरन्तर आत्मविकास से प्राप्त होती है। जीवन में सफलता मिले तो शून्य विनम्र बने रहने की प्रेरणा देता है, क्योंकि प्रत्येक सफलता कभी न कभी एक साधारण शुरुआत का परिणाम होती है और यदि असफलता मिले, तो वही शून्य पुनः नई शुरुआत का साहस देता है। प्रकृति भी यही शिक्षा देती है— सूर्योदय के बाद सूर्यास्त, पतझड़ के बाद बसन्त और बीज के बाद वृक्ष का निर्माण होता है। अतः जीवन का प्रत्येक अंत एक नए आरम्भ का संकेत है। शून्य हमें निराशा नहीं, बल्कि धैर्य, आशा और सतत पुरुषार्थ का पाठ पढ़ाता है।

व्यावहारिक जीवन में शून्य का वास्तविक अर्थ जीवन को संतुलित और सुव्यवस्थित बनाना है। समय का सदुपयोग, अनुशासित दिनचर्या, निरन्तर अध्ययन, विवेकपूर्ण निर्णय, धैर्यपूर्वक संघर्ष और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता व्यक्ति को क्रमशः उत्कृष्टता की ओर ले जाती है। जैसे गणित में शून्य उचित स्थान पर आकर संख्याओं का मूल्य अनेक गुना बढ़ा देता है, उसी प्रकार जीवन में छोटे-छोटे श्रेष्ठ संस्कार, सद्विचार और सत्कर्म व्यक्तित्व को महान बना देते हैं। सफलता केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि चरित्र, विश्वसनीयता, उत्तरदायित्व और निरन्तर आत्मपरिष्कार से प्राप्त होती है। यही शून्य का व्यावहारिक संदेश है कि जीवन का वास्तविक मूल्य बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आन्तरिक गुणवत्ता से निर्धारित होता है।

8. शून्य से अनन्त तक

“जब ‘मैं’ सीमित रहता है, तब जीवन छोटा होता है; जब ‘मैं’ मिट जाता है, तब अनन्त का द्वार खुल जाता है।”

शून्य से अनन्त तक की यात्रा केवल गणित का सिद्धान्त नहीं, बल्कि मानव जीवन की सबसे गहन आध्यात्मिक, दार्शनिक और मानवीय यात्रा है। गणित में शून्य और अनन्त दो भिन्न ध्रुव प्रतीत होते हैं, किन्तु भारतीय दर्शन में दोनों एक ही परम सत्य के दो आयाम हैं। शून्य सीमित अहंकार, संकीर्णता और व्यक्तिगत स्वार्थ के विसर्जन का प्रतीक है, जबकि अनन्त असीम चेतना, प्रेम, ज्ञान और ब्रह्म की पूर्णता का स्वरूप है। मनुष्य जब केवल अपने “मैं” तक सीमित रहता है, तब उसका संसार भी सीमित रहता है; परन्तु जैसे ही वह “हम” का भाव अपनाता है, उसके भीतर सहयोग, सेवा, करुणा और उत्तरदायित्व का विस्तार होने लगता है। और जब वह सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही परम चेतना का अनुभव करता है, तब उसके लिए न कोई पराया रहता है और न कोई भेद। अतः शून्य से अनन्त तक की यात्रा व्यक्ति से समाज, समाज से विश्व और विश्व से ब्रह्म तक पहुँचने की यात्रा है।

प्रकृति स्वयं शून्य से अनन्त की यात्रा का सजीव उदाहरण है। बीज अपने सीमित स्वरूप में रहते हुए भी विशाल वृक्ष बनने की क्षमता रखता है, एक छोटी जलधारा समुद्र का विस्तार प्राप्त करती है और आकाश की अनन्तता असंख्य ग्रह-नक्षत्रों को अपने भीतर समाहित किए रहती है। मानव जीवन भी इसी नियम का अनुसरण करता है। जब व्यक्ति अपने ज्ञान, अनुभव, संवेदना और कर्म का विस्तार केवल अपने तक सीमित न रखकर परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण मानवता के कल्याण में लगाता है, तभी उसका व्यक्तित्व सीमित से असीम की ओर अग्रसर होता है। यही आत्म-विस्तार भारतीय संस्कृति के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे सार्वभौमिक आदर्शों का वास्तविक आधार है।

9. शून्य का जीवन-संदेश

“शून्य स्वयं कुछ नहीं माँगता, परन्तु दूसरों का मूल्य बढ़ाकर अमर हो जाता है; यही जीवन की सच्ची महानता है।”

शून्य का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जीवन का मूल्य बाहरी आकार से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव से निर्धारित होता है। शून्य स्वयं मौन रहता है, किन्तु उचित स्थान पर आकर संख्याओं का मूल्य कई गुना बढ़ा देता है। यही सिद्धान्त मनुष्य पर भी लागू होता है। जो व्यक्ति अपने ज्ञान, व्यवहार, सहयोग, सत्यनिष्ठा और उत्तरदायित्व से दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है, वही वास्तव में महान कहलाता है। भारतीय संस्कृति ने सदैव ऐसे व्यक्तित्वों का सम्मान किया है जिन्होंने स्वयं से अधिक समाज के हित को महत्व दिया। इसलिए सच्ची सफलता प्रसिद्धि अर्जित करने में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा और उपयोगिता का स्रोत बनने में है।

10. उपसंहार : “शून्य ही पूर्णता का द्वार है”

“मनुष्य जब जन्म लेता है, तब वह शून्य होता है और जब इस संसार से विदा होता है, तब सब कुछ यहीं छोड़कर चला जाता है। इन दोनों शून्यों के बीच ही उसके जीवन का वास्तविक मूल्य निर्धारित होता है।”

मानव जीवन की सम्पूर्ण यात्रा का सार यही है कि शून्य अंत नहीं, बल्कि प्रत्येक पूर्णता का प्रारम्भ है। गणित में शून्य संख्याओं को मूल्य देता है, विज्ञान में तकनीकी क्रान्ति का आधार बनता है, दर्शन में परम सत्य का संकेत करता है और अध्यात्म में अहंकार से मुक्ति का द्वार खोलता है। यही कारण है कि शून्य केवल एक अंक नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला, सोचने की एक दिशा और आत्मविकास का शाश्वत सिद्धान्त है। मनुष्य अपने जीवन में धन, पद, प्रतिष्ठा और उपलब्धियों के अनेक शून्य जोड़ सकता है, किन्तु यदि उनके आगे सत्य, चरित्र, करुणा और सेवा का अंक न हो, तो वे सभी शून्य निरर्थक हैं। इसके विपरीत, यदि जीवन के आगे मानवता का एक अंक जुड़ जाए, तो साधारण जीवन भी असाधारण बन जाता है। यही शून्य का सबसे बड़ा गणित और यही जीवन का भी है।

आज का युग विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तीव्र तकनीकी परिवर्तन का युग है, किन्तु इसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं, नैतिक मूल्यों और संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। यदि वैज्ञानिक प्रगति के साथ चरित्र, करुणा, उत्तरदायित्व और मानवीय चेतना का विकास न हो, तो प्रगति अधूरी रह जाती है। शून्य हमें यही प्रेरणा देता है कि बाहरी उपलब्धियों के साथ-साथ आन्तरिक उत्कृष्टता का भी निरन्तर विकास होना चाहिए। यही संतुलन व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को स्थायी उन्नति की ओर ले जाता है।

अतः शून्य हमें यह अनुभव कराता है कि प्रत्येक आरम्भ में अनन्त संभावनाएँ छिपी होती हैं। यह विनाश का नहीं, नवसृजन का; निराशा का नहीं, आशा का; रिक्तता का नहीं, सृजनात्मक शक्ति का प्रतीक है। जो व्यक्ति ज्ञान, अनुशासन, सेवा, सदाचार और निरन्तर आत्मविकास को जीवन का आधार बना लेता है, उसके लिए प्रत्येक नया दिन एक नई शुरुआत बन जाता है। यही “शून्य से पूर्णता तक की जीवन-यात्रा” का शाश्वत संदेश है और यही भारतीय ज्ञान परम्परा की अमूल्य देन भी है।

॥ शून्य ही पूर्णता का द्वार है और पूर्णता ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है॥

योगेश गहतोड़ी (ज्योतिषाचार्य / साहित्यकार)
वाणी विहार, उत्तम नगर, नई दिल्ली – 11005

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