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सूने है आषाढ़ के बादल,

दूर दूर तक पानी का
नामो -निशान नहीं ,

खेत सूखे फसलें सूखी, तालाब भी सूखा हि
दिख रहा ।

हर आदमी आसमान को निहारता हुआ दिख रहा है

हर किसान है जो आस लिए खेतों की मेढ़ पर ही टिक रहा है ।

गांव में एक परम्परा है ,

गांव के बाहर रोटी बनाई जाए खाई जाएं,

दूर जंगल में इंद्र देव को मानते हुए भोग लगाएं जाए ।

भोग लगाकर प्रसाद लेकर यथासंभव देवनगरी सी ऊजैणीं करके घर को आ जाऐं

उल्टे भेरुजी घुमाएं,
मेंढकी पुजें,
टोटके करते हुए पानी मांगे,

खेतों को पानी की तलब है,
फसलों को पानी की प्यास है।

पानी भी कहिं नहीं दिख रहा है
मानसून तो दूर-दूर तक कहीं भी नहीं दिख रहा है।।

बरखा रानी झुमके बरसो,

अमृत जल,कल कल अविरल धारा को बरसाओ।।

हे इंद्र देव आपका हि सहारा अब हमें दिख रहा है

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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