
धर्मेंद्र कुमार राठौर
व्याख्याता भौतिक विज्ञान झालावाड़राजस्थान
आषाढ़ और सावन का महीना आते ही भारतीय किसान की आँखों में नई उम्मीदें जन्म लेती हैं। खेतों में हल चलने लगते हैं, बीज मिट्टी की गोद में सौंप दिए जाते हैं और हर नज़र आसमान पर टिक जाती है। किसान जानता है कि उसकी मेहनत तभी रंग लाएगी, जब बादल अपनी कृपा बरसाएँगे। लेकिन इस वर्ष झालावाड़ जिले का आकाश जैसे मौन हो गया है। बादल आते हैं, ठहरते नहीं; हवाएँ चलती हैं, पर वर्षा की बूँदें धरती तक नहीं पहुँचतीं।
दिन भर उमस भरी गर्मी शरीर को झुलसाती है और रातें भी राहत नहीं देतीं। खेतों में बोई गई सोयाबीन, मक्का, उड़द और अन्य खरीफ़ की फसलें पानी के अभाव में पीली पड़ने लगी हैं। जिन पौधों में हरियाली लहलहानी चाहिए थी, वे जीवन के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं। किसान हर सुबह खेत जाता है, सूखती फसल को देखता है और फिर आसमान की ओर निहारता है—शायद आज कोई बदली आए, शायद आज धरती की प्यास बुझ जाए।
गाँवों में आज भी लोकविश्वास जीवित हैं। कहीं मेंढक-मेंढकी का विवाह कराया जा रहा है, कहीं गाँव के बाहर सामूहिक भोजन बनाकर इंद्रदेव से वर्षा की प्रार्थना की जा रही है। महिलाएँ लोकगीत गा रही हैं, बच्चे उत्सुक हैं और बुज़ुर्ग पुराने दिनों को याद कर रहे हैं। यह अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था और असहाय मन की पुकार है। जब सारे वैज्ञानिक उपाय भी प्रकृति की इच्छा के सामने सीमित पड़ जाएँ, तब मनुष्य प्रार्थना का सहारा ही तो लेता है।
चिंता केवल खरीफ़ की फसल तक सीमित नहीं है। यदि आज वर्षा नहीं होगी तो कल नदियाँ कैसे बहेंगी? बाँध, तालाब और जलाशय कैसे भरेंगे? रबी की फसल के लिए सिंचाई का पानी कहाँ से आएगा? यही वर्षा का जल तो पूरे वर्ष जीवन का आधार बनता है। इसी से खेत सींचे जाते हैं, इसी से शहरों और गाँवों की प्यास बुझती है, इसी से पशु-पक्षियों का जीवन चलता है।
बारिश का अभाव केवल खेतों को नहीं सुखाता, यह किसान के मन को भी बंजर कर देता है। उसकी आँखों में पलते सपने, बच्चों की पढ़ाई की उम्मीदें, परिवार की खुशियाँ और पूरे वर्ष की आजीविका—सब कुछ इन्हीं बादलों से जुड़ा होता है। सूखती फसलें केवल पौधे नहीं होतीं, वे किसान के अरमानों की मुरझाती हरियाली होती हैं।
आज आवश्यकता केवल वर्षा की प्रार्थना करने की नहीं, बल्कि जल संरक्षण को जीवन का संस्कार बनाने की भी है। हर वर्ष गिरने वाली हर बूँद को सहेजना होगा। तालाबों का संरक्षण, नदियों का पुनर्जीवन, वर्षाजल संचयन और भूजल का संतुलित उपयोग ही भविष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा है। क्योंकि आने वाले समय में पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का सबसे अनमोल धन होगा।
आइए, हम सब मिलकर प्रार्थना करें कि इंद्रदेव की कृपा फिर से बरसे, धरती की प्यास बुझे, खेत फिर से लहलहाएँ, नदियाँ कल-कल बहें और किसान के चेहरे पर फिर वही मुस्कान लौट आए, जो किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी समृद्धि का प्रतीक होती है।
जब किसान मुस्कुराता है, तभी देश समृद्ध होता है;
और जब बादल रूठ जाते हैं, तो केवल खेत नहीं, पूरी सभ्यता चिंता में डूब जाती है।
धर्मेंद्र कुमार राठौर व्याख्याता भौतिक विज्ञान
झालावाड़ राजस्थान













