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जीवन चंद दिनों का मेला है

जीवन चंद दिनों का मेला है
यहाँ सुख दुख का झमेला है

जीवन रंगमंच की तरह है
अपना अपना रोल करना है

जीवन पानी का बुलबुला है
कब खत्म हो पता नहीं चलता

जीवन में कौन अपना है सुनो
यहाँ कौन पराया है पता नहीं

कहने को तो जीवन आनंद है
मगर ये सुख – दुख का द्वंद है

जीवन में खुशी गम दोनों आते
हर हाल में यूँ चलते जाते हम

यह रिश्तों के ताने बाने बुनता
जीवन समर्पण से सूखी बनता

जीवन चक्रव्यूह की तरह होता
हर पल उलझन में फंसा होता

डॉ. राजेश कुमार शर्मा पुरोहित
भवानीमंडी

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