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इच्छाओं का अंत

हाँ, हो जाता इच्छाओं का अंत,
जब जीवन ढलने लगता शांत।
कंधों से जब उतरें दायित्व,
मन खोजे केवल सुख का सत्य।

जीवनसाथी बिछुड़ जाए जब,
सूना लगता हर एक सबब।
यादों का दीपक जलता रहता,
मौन हृदय सब कुछ कहता।

कान सुनें धीमे स्वर अब,
धुंधली आँखें देखें कम।
दाँत साथ भी छोड़ने लगते,
श्वेत केश अनुभव कहते।

पराधीन तन, थके हुए पग,
धीमी पड़ जाती जीवन-लगन।
वैभव, यश, सम्मान सभी,
लगते क्षणभंगुर तब सभी।

तब मन कहता—बस इतना हो,
अपनों का स्नेह सदा संग हो।
अंत समय की यही पुकार—
प्रेम रहे जीवन का आधार।

इच्छाएँ सचमुच शांत हो जातीं,
जब आत्मा ईश्वर से मिल जाती।
मोह-माया का बंधन छूटे,
शाश्वत शांति हृदय में फूटे।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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