
मेरा स्कूल
सिर्फ इमारत नहीं था,
वह
मेरी पहली दुनिया थी।
जहां सुबह की प्रार्थना
हवा में ही नहीं,
दिल में भी गूँजती थी,
और
लाइन में खड़े-खड़े
करते थे अभ्यास हम
बड़े होने का।
यूनिफ़ॉर्म
थोड़ी बड़ी होती थी,
पर
सपने
उसमें पूरे फिट आते थे।
कक्षा की बेंचें
सिर्फ़ बैठने की जगह नहीं थीं,
वे तो
अड्डे थे
दोस्ती के ।
कॉपी के आख़िरी पन्ने
सबसे आज़ाद होते थे,
वहीं
पहली कविता,
पहली चित्रकारी,
और
पहला डर
छुपा रहता था।
टीचर की डाँट में
डर कम,
सम्मान ज़्यादा था,
और
शाबाशी
पूरा दिन
मुस्कान बनकर
साथ चलती थी।
लंच बॉक्स
सिर्फ़ खाना नहीं होता था,
वह
घरों की खुशबू
आपस में बाँट देता था।
छुट्टी की घंटी
सबसे ईमानदार आवाज़ थी,
जो
सारी थकान को दूर कर देती थी।
आज
जब किसी बच्चे को
स्कूल जाते देखती हूँ,
तो
मेरी यादें
फिर से
बैग टाँग लेती हैं।
वही मैदान,
वही ब्लैकबोर्ड,
सब कुछ वैसा ही है
पर
मैं
अब
उन्हीं यादों की
टीचर बन चुकी हूँ।
लक्ष्मी नितिन डबराल
मुजफ्फरनगर













