
चलो! अब चलते हैं,
दूर कहीं जहां ना हो,
दुनिया का कोलाहल।
बचके बस निकलते हैं,
जहां ना हो अब हमारी,
कोई जवाबदारी का प्रश्न।
तनाव ना हो अब,
बस मामूली से,
मानव ही तो है हम ।
बस अब दूर चलते हैं,
द्वेष ईर्षा के तालाब,
के पार चलते हैं।
जहां ना हो,
हैवानियत की जड़ें फैली हुई,
ऐसी ज़मीन अब खोज निकालते है।
नफरत भरी पदचिन्हों पर क्यों चलना,
जब चाहते हो हर पल,
बस दिल से खिलखिलाना।
चलो अब चल ही देते है,
ख्यालों की दुनिया में जाने के लिए,
पैसे भी तो नहीं लगते हैं।
माना वक्त नहीं है किसी के पास,
पर डर – डर के क्या ?
ढूंढ लिया आनंदित रहने का राज़ ?
कल क्या होगा जब पता नहीं,
तो खुद खुशी के भंवर जाल में क्यों ,
धंसते जाते हो ?
अपनो से दूर तो तब भी होना पड़ेगा ना,
तो उस वक्त से पहले अपनो को,
क्यों नहीं खुलके बतलाते हो ।
वो वक्त भी बह जाएगा,
बस बहने दो अपने भावों को,
कोई नहीं समझेगा और कोई समझ गया तो भी होगा क्या?
दुनिया में खुद को क्यों खोजा करते हो,
खुद की दुनिया में जब खुश रहना जानते हो,
ये पल भी बीत जाएगा और यादों में कैद हो जाएगा।
चलो ! अब मैं चलती हूँ,
तुम्हारी परेशानियों को फुसलाके,
थोड़ा तुमसे दूर कर देती हूँ।
कुशाग्र वर्मा













