
बाबा: “कहाँ? कहाँ जा रहे हो?”
राहुल: “शहर जा रहा हूँ।”
बाबा: “अरे! शहर, शहर मत बोलो!”
राहुल: “फिर?”
बाबा: “बोलो… मुखौटों के नगर जा रहे हो।”
जहाँ हर चेहरे पर नक़ाब होगा,
झूठी बातों का सच सा जवाब होगा।
सब मग्न होंगे अपनी ही धुन में,
सबका अपना एक अलग हिसाब होगा।
जहाँ हर चेहरे पर नक़ाब होगा।
महफ़िलें तो मिलेंगी तमाम वहाँ,
मगर तन्हाइयों में हर जन बेताब होगा।
लाख ढूँढोगे शहर में कोई अपना,
बस बंद आँखों में एक अधूरा सा ख़्वाब होगा।
जहाँ हर चेहरे पर नक़ाब होगा।
अपनेपन के पीछे भी छिपा है शातिर वहाँ,
मालूम चलेगा… तो दर्द बेहिसाब होगा!
धँस चुके होगे तुम भी उन फरेबियों के जाल में,
जब तक उठेगा पर्दा और वो बेनक़ाब होगा।
जहाँ हर चेहरे पर नक़ाब होगा।
लेखिका – मोहिनी













