
जब चारों तरफ असफलता ही खुद का नसीब बन जाये
नाकामी आपके साथ साये सा चिपक जाये
इम्तिहान आपकी तकदीर का जब ऊपरवाला ही लेने लगे
किसके दर पर ठिकाना है अब प्रश्न जब चुभने लगे
सौ अच्छे कामों पर एक गलती ही प्रश्न की धार बनती है
दुनियाँ की नज़र मे बुराई का बाजार बनती है
नज़रिया दुनियाँ का इंसान मे भगवान् ढूँढने लगे है
क्या कहें कि दौर-ए-मकाम मे प्रश्न भी जब चुभने लगे
हर इंसान दुनियाँ मे खुद को भगवान् मानता है
दुनियाँ बाकि हैवान है येही जानता है
पाप अनाचार फिर है कहाँ जब रावण ही राम बनने लगे
कलयुग का ही ये प्रकोप है जब ऐसे ही प्रश्न चुभने लगे
न्याय की लड़ाई अब खतम सी है अन्याय के लिये ही सारी लड़ाई है
झूठी शोहरत झूठी शान की चकाचोंध मे ही कायनात सारी समाई है
इंसान इंसान को ही उसके मूल से बदस्तूर डिगाने लगे
ईश्वर की धरा मे ईश्वर कहाँ है यक्ष है प्रश्न जब चुभने लगे
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













