
परिदृश्य में हि दृष्टिकोण बंधा है,
और दृष्टिकोण से व्यक्तित्व बना है।
दृश्य में दर्शन हुआ है,
और दर्शन से दृष्टि बंधी हुई है।
दृश्य में निहित मनोभाव उत्पन्न हुआ है, और मनोभाव में
मनोरंजन छुपा होता है।
किसी का भी प्रतिक हों या चिन्ह हो या फिर कोई प्रतिमा,
भाव हि भावना पैदा करता है और
भावनाएं प्रबल हो तो
प्रेम जगाती हैं,
भावनाएं अंत: हृदय पृष्ठ पर प्रेम रस बरसाती है, और
प्रेम योग से वशिभुत हों कर वशिकरण में बंध जाते हैं,
बन्धन में यम ,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान ,समाधि ,भक्ति ,स्मरण और शक्ति है
जो सभी को शिक्षित करने में सक्षम होती है ।
सभ्यता और संस्कृति का दर्शन कर सकते हैं जब शिक्षित हो और
शिक्षा को बढ़ावा देने से जीवन में संस्कार वान बनते हैं।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)













