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करवटें बदलते रहे सारी रात हम

मौसम की बेरुखी ने इतना तपाया की जागते रहे हम

रात में लाइट की आंख मिचोली कर गई सितम ।
देर तक नींद ना आई तो बेरुखे हो गए हम
काफी देर बाद लाइट आई तो थकी हुई पलकों को सीमेंट कर सो गए हम
पर आज सुबह जल्दी नहीं उठ पाए हम

धर्मेंद्र कुमार राठौर

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