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कहानी: उस दिन

सुबह के ठीक साढ़े पाँच बजे थे। अलार्म बजने से पहले ही जाग जाना सावित्री की बरसों पुरानी आदत थी। बिस्तर से उठते ही जब उसने अपना दायाँ पैर ज़मीन पर रखा, तो घुटने से एक तेज़ दर्द की लहर उठी। उसने कसकर आँखें बंद कीं, एक पल को रुकी, और फिर घुटने को सहलाते हुए मुस्कुरा दी। रसोई की तरफ बढ़ते उसके कदमों में कोई शिकन नहीं थी। एक घरेलू महिला की ज़िंदगी भी कितनी अजीब होती है न! रोज़ वही सुबह की चाय, वही नाश्ता, वही डिब्बे पैक करना, वही झाड़ू-पोछा। बाहर की दुनिया इसे ‘मोनोटोनस’ या उबाऊ कह सकती है, पर सावित्री के लिए इस एक जैसे दिखने वाले चक्रव्यूह में हर दिन एक नया रस छुपा होता था। उसे कभी बोरियत छू तक नहीं पाती थी, क्योंकि इस काम के पीछे किसी बॉस की घुड़की नहीं, बल्कि उसके अपनों की सेहत और मुस्कान जुड़ी थी।
लेकिन ‘उस दिन’ कुछ अलग था। दोपहर होते-होते सावित्री के घुटनों का दर्द असहनीय हो गया था। डॉक्टर ने साफ़ लफ़्ज़ों में मुकम्मल आराम की हिदायत दी थी। पर लेटे-लेटे भी सावित्री का मन बिस्तर पर कहाँ था? वह छत को ताक रही थी, पर उसकी आँखों के सामने रसोईघर घूम रहा था। दर्द की उस तीव्र लहर में भी उसे अपनी तकलीफ से ज़्यादा इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि शाम को जब उसके पति दफ्तर से थक-हारकर लौटेंगे, तो उन्हें अदरक वाली कड़क चाय कौन बना कर देगा? बेटा जब कॉलेज से भूखा आएगा, तो अलमारी के किस कोने से अपनी मनपसंद नमकीन ढूँढेगा?
शाम के सात बजे। घर के मुख्य दरवाज़े का ताला खुला। सावित्री ने लेटे-लेटे ही आहट पहचानी—यह उसके पति रमेश के कदम थे। रमेश कमरे में आए, सावित्री के चेहरे पर दर्द की लकीरें देखकर उनका दिल भर आया। उन्होंने तुरंत उसके सिर पर हाथ रखा और बेहद अपनापन और फिक्र से कहा, “तुम लेटी रहो सावित्री, आज मैं चाय बनाता हूँ।”
सावित्री ने उठने की कोशिश की, “अरे नहीं, आप थक कर आए हैं, मैं बस अभी…”
रमेश ने उसे डांटते हुए वापस लिटा दिया, “एक दिन रसोई में नहीं जाओगी तो प्रलय नहीं आ जाएगी। तुम बस आराम करो।”
सावित्री तकिए के सहारे बैठ गई। रसोई से बर्तनों के टकराने की आवाज़ें आ रही थीं। रमेश कभी चीनी का डिब्बा ढूँढ रहे थे, तो कभी चायपत्ती। थोड़ी देर में रमेश एक हाथ में चाय के दो कप और दूसरे हाथ में बिस्कुट की प्लेट लिए कमरे में दाखिल हुए। चाय का रंग थोड़ा सा फीका था और अदरक शायद ठीक से कुचली नहीं गई थी, लेकिन सावित्री ने जब पहला घूंट लिया, तो उसे लगा कि दुनिया की सबसे बेहतरीन चाय यही है। उसके दिनभर की सारी शारीरिक थकान और घुटनों का दर्द उस एक प्याली और रमेश की फिक्र में कहीं हवा हो गया।
तभी रमेश हँसते हुए बोले, “वैसे सावित्री, सच कहूँ तो तुम्हारी रसोई किसी तिलिस्मी गुफा से कम नहीं है। मुझे तो हल्दी के डिब्बे के पीछे छुपा नमक का जार मिला ही नहीं, वो तो ऐन वक्त पर काम आ गया। तुम महिलाएँ भी कमाल हो, पूरा घर दिमाग में लेकर चलती हो।”
सावित्री मुस्कुरा दी। उसने चाय का कप मेज पर रखा और एक गहरी सांस लेकर कहा, “सच कहूँ जी, मेरा बस चले तो मैं भगवान के यहाँ जाने से पहले भी एक पूरा शेड्यूल लिखकर जाऊँ! पूरे सात पन्नों का पर्चा बनाऊँगी—सोमवार को दाल में हींग का तड़का लगाना है, मंगलवार को बच्चों के सफेद कपड़े धोने हैं, बुधवार को आपकी शुगर की दवाइयाँ लानी हैं, और हाँ, किस डिब्बे के पीछे कौन सा मसाला छुपा है, उसकी पूरी मैपिंग करके जाऊँगी। वरना मेरे बिना आप लोग तो भूखे ही रह जाएँगे!”
सावित्री की यह बात सुनकर रमेश के चेहरे की हँसी एक पल को ठिठक गई। उन्होंने सावित्री का हाथ अपने हाथों में लिया। उनकी आँखों में वही पुराना, गहरा अपनापन तैर आया, जो बरसों पहले था। रमेश ने मुस्कुराकर कहा, “किराया तो तुम देती नहीं हो घर का, और बातें इतनी लंबी-चौड़ी करती हो! भगवान के घर जाने की बात सोचना भी मत, समझे? तुम्हारे इस शेड्यूल के बिना यह घर, घर नहीं रहेगा, सिर्फ कंक्रीट का एक ढांचा बनकर रह जाएगा।”
सावित्री लाज से मुस्कुरा उठी। खिड़की से आती ठंडी हवा कमरे के माहौल को और खुशनुमा बना रही थी। उस दिन सावित्री को एक बात का अहसास बेहद शिद्दत से हुआ—एक औरत का पूरा जीवन भले ही रसोई की चौखट और घर की चारदीवारी के बीच बीत जाता है, लेकिन अगर उस घेरे के भीतर ऐसा सम्मान, ऐसी फिक्र और ऐसा चुलबुला अपनापन हो, तो हर दर्द बौना साबित हो जाता है। रिश्तों की असली मिठास किसी बड़े वादे या महँगे तोहफे में नहीं, बल्कि इसी सहज, अनकहे और फिक्र से भरे लम्हों में बसती है। घुटनों का दर्द अब भी था, लेकिन सावित्री के चेहरे की वह छोटी सी मुस्कान उसके पूरे अस्तित्व को सुकून से सराबोर कर चुकी थी।

कवयित्री ज्योति बरनवाल, नवादा (बिहार)

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