
बनो ज्ञानी बनो दानी न बहे आंख का पानी
संयोग से जीवन मिला सहयोग से चलानी
बदल के रख जमाने को लिखो नई कहानी
तुम हिमालय झुका सकते नभ बना नपानी
परेशानियां बहुत जीवन में नही कोई ग्लानी
व्यवस्थित हो जीवन बन कर गुणों की खानी
टाल दो कुछ व्यथायें मन बना ढीठ अनमानी
लगा दो आग पानी में बना दो आग को पानी,
लेखनी में वो ताकत है नहीं इसका कोई मानी।
-गोवर्धन थपलियाल













