
चलो जलाएं दीप वहां
जहां अभी भी अंधेरा है…
स्वेच्छाचारी मुक्त विहारी
युवजन खाएं ठोकर आज..!
झूठी शान और अहंकार का,
भाव सभी पर करता राज..!!
प्रेमहीन परिवार तंत्र ने,
डाला अब यहाँ डेरा है ॥१॥
सुजला सुफला धरती माँ को
भोग विलास ने है लूटा..!
पृथ्वी माँ हम बच्चे उसके,
तत्व लगे यह अब झूठा..!!
भौतिकता की विषवेला ने,
अखिल विश्व को घेरा है ॥२॥
युद्ध , लड़ाई, लूटपाट से,
वसुंधरा है लहूलुहान..!
समता, ममता से ही संभव,
सदा हुआ मानव कल्याण…!!
ज्ञान, ध्यान, विज्ञान सभी का,
ना केवल तेरा मेरा है..।।३।।
नही थकेंगे, नही रुकेंगे,
बढते जाएं आगे हम..!
परिवर्तन की पावन बेला,
लाकर ही हम लेंगे दम…!!
सत्यबोध के रूप मे देखो,
अब हो रहा सवेरा है ॥४॥
भानुप्रकाश शर्मा













