Uncategorized
Trending

मंगल पाण्डेय (स्मृतियों के बीच)


सैकडों वर्षों से गुलामी झेल रहा था भारतवर्ष l
सन 1857 में आज़ादी का बिगुल बजा,सबको हुआ हर्षll

चल पड़े अपनी आहुति देने स्वतंत्रता के राही l
नहीं की परवाह जान माल की, ऐसे थे वीर प्रवाही ll

19 जुलाई 1827 को नया सवेरा आया l
नगवा ( बिहार) ने एक देवदूत
था पाया ll

होश संभाला, बचपन से ही ये अहसास हुआ l
माँ है बंदी, उसे मुक्त कराना है, ये प्रयास हुआ ll
**
बने सिपाही, कूद पड़े,
लेकर क्रांति की धारा l
स्वाभिमान की सीढ़ी चढ़े, कभी नहीं वो हारा ll
**
मात्र 29 वर्ष की उम्र में, अंग्रेज़ों से युद्ध किया l
आज़ादी लेकर रहेंगे, ये प्रण मन में ठान लिया ll
**
अद्भुत शौर्य और वीरता का उनमें था संगम l
कभी नहीं पीछे मुड़ देखा, दृश्य था विहंगम ll
**
हँसते हँसते फांसी का फन्दा
कर लिया स्वीकार l
छोटी सी ही उम्र में, बना
दिया हमें अपना कर्ज़दार ll
**
जब तक सृष्टि रहेगी अमर रहेगा उनका बलिदानl
“मंगल पाण्डेय” वीर को हम सदा अपने बीच महसूस करें ससम्मान ll
**
उनका बलिदान सफल होगा,
जब हम सब रहें एक l
भुलाकर आपसी मतभेद, बढें उन्नति पथ पर, साथ हो विवेक ll

सरोज बाला सोनी
कवयित्री

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *