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सालम क्रांति की अमर वीरांगना : स्वर्गीय श्रीमती नारायणी देवी

– योगेश गहतोड़ी “यश” (ज्योतिषाचार्य / साहित्यकार)
मोबाईल: 9810092532, नई दिल्ली – 110059

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक महान क्रांतिकारियों, सत्याग्रहियों और बलिदानियों के अमर योगदान से आलोकित है। किंतु इतिहास का एक पक्ष ऐसा भी है, जहाँ अनेक महिलाओं के अद्वितीय त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया। परिणामस्वरूप अनेक वीरांगनाएँ समय के साथ इतिहास के पन्नों में कहीं ओझल हो गईं। ऐसी ही एक असाधारण वीरांगना थीं स्वर्गीय श्रीमती नारायणी देवी, जिन्होंने स्वयं किसी मंच पर खड़े होकर भाषण नहीं दिए, न ही किसी पद या सम्मान की आकांक्षा की; फिर भी उनका त्याग और राष्ट्रसमर्पण किसी भी महान स्वतंत्रता सेनानी से कम नहीं था। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि राष्ट्रनिर्माण केवल रणभूमि में ही नहीं, बल्कि मातृत्व, त्याग और आत्मबल के माध्यम से भी होता है।

स्वर्गीय श्रीमती नारायणी देवी उत्तराखण्ड के मल्ला सालम पट्टी के लमकोट गाँव की निवासी थीं। वे अत्यंत साधारण, अशिक्षित एवं ग्रामीण परिवेश में जीवन व्यतीत करने वाली एक धर्मपरायण महिला थीं। औपचारिक शिक्षा का अभाव होने के बावजूद उनमें अद्भुत विवेक, दूरदर्शिता, राष्ट्रप्रेम और त्याग की भावना विद्यमान थी। वे देश में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन तथा कौमी सेवा दल की गतिविधियों से निरंतर परिचित रहती थीं। उनका व्यक्तित्व इस बात का सशक्त उदाहरण था कि महान बनने के लिए केवल अक्षरज्ञान पर्याप्त नहीं होता; उच्च विचार, दृढ़ संकल्प और राष्ट्र के प्रति समर्पित हृदय ही किसी व्यक्ति को महान बनाते हैं। वे अपने नाम के अनुरूप सचमुच शक्ति, करुणा और त्याग की प्रतीक “नारायणी” थीं।

सन 1938 में स्वतंत्रता सेनानी श्री राम सिंह ‘आज़ाद’ बॉम्बे से अपने ग्राम सांगड़ लौटे और सम्पूर्ण सालम क्षेत्र, विशेषकर मल्ला सालम में कौमी सेवा दलों का गठन कर राष्ट्रीय चेतना का व्यापक अभियान प्रारम्भ किया। वे घर-घर जाकर युवाओं को देश की स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करते थे। उनके ओजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर असंख्य नवयुवक आंदोलन में सम्मिलित होने लगे। इन्हीं दिनों नारायणी देवी ने भी अपने बड़े पुत्र श्री प्रताप सिंह को राष्ट्रसेवा के लिए आंदोलन में समर्पित कर दिया। एक साधारण ग्रामीण, विधवा माँ द्वारा अपने पुत्र को उस ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष के लिए भेज देना, जिसके विषय में कहा जाता था कि “उसके साम्राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता”, अत्यंत साहस और अद्वितीय राष्ट्रभक्ति का परिचायक था।

सन 1942 में महात्मा गांधी द्वारा “करो या मरो” का आह्वान किए जाने के बाद सालम क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन ने और अधिक तीव्र रूप धारण कर लिया। श्री राम सिंह ‘आज़ाद’ पुनः गाँव-गाँव जाकर लोगों को आंदोलन के लिए संगठित कर रहे थे। जब वे नारायणी देवी के घर के सामने से यह सोचकर आगे बढ़ने लगे कि वे अपना एक पुत्र पहले ही राष्ट्र को समर्पित कर चुकी हैं, तभी नारायणी देवी ने उन्हें रोक लिया। उन्होंने अपने छोटे पुत्र श्री पूरन सिंह का हाथ श्री आज़ाद के हाथों में सौंपते हुए कहा— “मैं अपना बड़ा बेटा पहले ही देश के लिए आपको सौंप चुकी हूँ, अब इसकी बारी है।” एक वृद्ध एवं विधवा माँ द्वारा अपने भविष्य, बुढ़ापे और सहारे की चिंता किए बिना अपने दोनों पुत्रों को राष्ट्र के चरणों में समर्पित कर देना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की अनुपम घटनाओं में से एक है।

देश स्वतंत्र होने के बाद भी नारायणी देवी की राष्ट्रसेवा समाप्त नहीं हुई। 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात जब गांधी स्मारक निधि के लिए श्री राम सिंह ‘आज़ाद’ घर-घर जाकर सहयोग एकत्रित कर रहे थे, तब नारायणी देवी ने उन्हें अपने कान का लगभग एक तोले का स्वर्ण मुंनड़ा उतारकर दान कर दिया। जब श्री आज़ाद ने दूसरा आभूषण देने का आग्रह किया, तो उन्होंने अत्यंत सहज भाव से कहा— “दूसरा मुंनड़ा मैं अपनी अंतिम यात्रा (अंत्येष्टि) के लिए रखूँगी।” यह घटना उनके त्याग, संवेदनशीलता और राष्ट्रहित को व्यक्तिगत आवश्यकताओं से ऊपर रखने की अद्भुत मिसाल है।

किन्तु उनकी त्यागगाथा यहीं समाप्त नहीं हुई। सन 1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण किए जाने के बाद देश कठिन आर्थिक और सैन्य संकट से गुजर रहा था। राष्ट्रीय रक्षा कोष के लिए पुनः श्री राम सिंह ‘आज़ाद’ जनसहयोग एकत्रित करने निकले। उस समय नारायणी देवी जीवन के अंतिम चरण में थीं। उनके कान में शेष बचा वही अंतिम स्वर्ण मुंनड़ा था, जिसे वे अपनी अंत्येष्टि के लिए सुरक्षित रखना चाहती थीं। किंतु जब राष्ट्र पर संकट आया, तब उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के वह अंतिम आभूषण भी रक्षा कोष में दान कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने जीवन की अंतिम निजी पूँजी भी राष्ट्र के चरणों में समर्पित कर दी। ऐसा उदाहरण भारतीय इतिहास में अत्यंत विरल है।

स्वर्गीय श्रीमती नारायणी देवी का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची सम्पन्नता धन-संपत्ति के संचय में नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए त्याग करने की क्षमता में निहित होती है। वे आर्थिक दृष्टि से सामान्य थीं, किन्तु उनके विचार, साहस और उदारता उन्हें आध्यात्मिक रूप से अत्यंत समृद्ध बनाते हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि जो व्यक्ति अपने भीतर स्थित दिव्य स्वरूप को पहचान लेता है, वही निःस्वार्थ भाव से समाज और राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर सकता है। उनका जीवन लोभ, मोह और स्वार्थ पर त्याग, सेवा और कर्तव्य की विजय का जीवंत उदाहरण है।

आज आवश्यकता है कि स्वर्गीय श्रीमती नारायणी देवी जैसी गुमनाम वीरांगनाओं के जीवन को नई पीढ़ी के सामने लाया जाए, ताकि इतिहास केवल पुरुषों की वीरगाथाओं तक सीमित न रहे, बल्कि उन मातृशक्तियों का भी सम्मान करे जिन्होंने अपने पुत्रों, अपने आभूषणों और अंततः अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। उनका त्याग, राष्ट्रप्रेम और अद्भुत साहस सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जाना चाहिए।

स्वर्गीय श्रीमती नारायणी देवी को विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।

योगेश गहतोड़ी “यश” (ज्योतिषाचार्य / साहित्यकार)
मोबाईल: नई दिल्ली – 110059

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