
रीति-नीति अपनी यही, पूँजू भोलेनाथ।
खिल जाती दिल की कली,मिले शंभु का साथ।
यत्न यही रहता सदा,चलूंँ सत्य की राह,
श्रवण करूंँ हर पल कथा, झुका रहे निज माथ।।
सदाचार आधार हो, भक्ति भाव का रंग।
द्वेष दंभ से दूर रह, वेद शास्त्र का ढंग।
कर्म सदा करती रहूंँ, रहे न फल की आस,
गीता के शुचि ज्ञान से,उर में रहे उमंग।।
जले ज्ञान का दीप जब, तमस सकल हो दूर।
सुखद लगे संसार तब, मिले शक्ति भरपूर।
मंगलकारी हो दिवस, कृपा मिले जब शंभु,
करुणा के भंडार हैं, करें अहम को चूर।।
सुधि सबकी लेते सदा, करते कष्ट निदान।
अभयंकर हैं शंभु जी, जग में बड़े महान।
जो भी आता है शरण, उसका हो उद्धार,
कालों के तो काल हैं, तीन लोग पहचान।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश













