संस्कार प्रवाहित हुए हैं यदि संतति।
सनातनी को गर्व अक्षुण्ण स्व संस्कृति।
चहुं दिस पाश्चात्य मूल्य हैं चाहे भारी।
जिएं सगर्व पश्चिम में सनातनी संस्कारी।
धर्म-ध्वजा संग विश्व में पहचान हमारी।
खान-पान न बदला,अहिंसा के पुजारी।
बुद्धिबल पर संतति ने लहराई पताका।
विज्ञान-गणित डंका बजे भारत मां का।
कठोर श्रम के आगे विश्व बना बेचारा।
पश्चिम लोहा माने पूर्व की बही है धारा।
विज्ञान के क्षेत्र में बढे, जाने जग सारा।
पूर्व की पताका लहराए ये युवा हमारा।
सुविधा मिले न कोई सानी समुद्र पार।
श्रम ही जीवन मूल्य जान गए होनहार।
अपनी धरा न समझें बुद्धि मूल्य अपार।
जिसने ये जाना उसका जग अधिकार।
होनहार युवा को न डालो अब मझधार।
समय सन्निकट है युवा पग बढ़े अपार।
पशुबल का था कभी विश्व पे अधिकार।
अब बौद्धिक बल से हो मुट्ठी में संसार।
महेश शर्मा, करनाल
(थॉरोल्ड-नियाग्रा फॉल्स से )











