
सत्य कर्म है क्या
और असत्य है क्या
जाने सब की अंतर्रात्मा
जान गया अगर सत्य को
कैसी भी हों परिस्थितियां
सदात्मा न करे परवाह।
क्षणभंगुर सी ये तेरी काया
रचा जगत ये उसकी माया
वो ही तो जीव को जग में लाया
यहां कोई अपना न पराया
ये दंभ कैसा ? क्या जीव जगत हर्षाया?
उसका भेजा मृत्युलोक तूं आया
मूढ़ नर स्वार्थ रत फिरे भरमाया
स्वयं को मान स्वयंभू
अपनी चतुराई पर स्वधर्म भुलाया
अपने कर्मों से किस को नहीं सताया ।
चार दिन की ये चांदनी
क्यूं सत्कर्म को भुलाया
कर्मों का लेखा जग पढ़ पाया
उस की बही में सब दर्ज कराया
ये मनुज जन्म पा क्यूं उसे नसाया ।
महेश शर्मा करनाल










