
अंतिम युद्ध अंतरंग द्वंद्व सा अंतर्द्वंद्व बंध से मन का !
लड़ रहे हो क्या जीवन को तुम या फिर सफ़र मौत तरंग का !!
तिल तिल श्वास घुटन के जैसी फिर मुस्कान किस उमंग का !
मोल समझे तुम शायद हो नही जीवन के उन्मुख प्रसंग का !!
लगता भले ही मुश्किल दौर है पर है तो न इक अटल तरंग सा !
सोचो जो गर श्वास न हो तो लगता नही बदरंग हर रंग सा !!
किसकी दौड़ मे शामिल हो तुम धावक नही कोई तुम सा प्रसन्न सा !
लाख समस्या आन खड़ी हो पर खुशी ही ढूँढे मस्त मलंग सा !!
यहीं है युद्ध और अंतिम नही पर हर ठौर मन विचलित प्रसंग सा !
जीवन दर्शन का सौंदर्य बोध लोभ जीने की जंग सा !!
‘सरल’ कठिन ही बहुत है बाते अंतिम युद्ध के हर प्रसंग का !
सरल है तो बस गरल सजाना वह भी शिव सा कंठस्थ और कंठ का!!
संदीप शर्मा सरल
देहरादून उत्तराखंड













