Uncategorized
Trending

ग़ज़ल

सोच अपनी बदल नहीं पाए।
हम किसी राह चल नहीं पाए।

आजमाते रहे कभी जिनको,
उन रिवाज़ो में ढल नहीं पाए।

आस जितनी रही घटाओं से,
अब्र उतने पिघल नहीं पाए।

रात-दिन राह भर चले लेकिन,
पार हद से निकल नहीं पाए।

वक़्त के साथ-साथ रहकर भी,
चंद लम्हें संभल नहीं पाए।

बोल थे,साज़ थे,मिले सुर भी,
दिल हमारे बहल नहीं पाए।
—-नवीन माथुर पंचोली

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *