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मदनोत्सव

प्रकृति सुरभित हो गई देख काम कमान
रति भी ललचा रही देने को मधु रसपान
उत्साह उमंग से भरे हुये निकल पडे मदन
नियति हर्षित हो बहा रही मकरंद पवन
पक्षी कलरव करें कुहुकी कोयल वन उपवन 
धरती पर पीली चादर बिछी उभर गया यौवन।
गोवर्धन थपलियाल

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