
विधा – स्वतंत्र
अपना हक मांगने पर,
मिले लाठियों की मार है।
भ्रष्ट शासन व्यवस्था और,
तानाशाही भरमार है।।
गुनहगारों को क्यों बचाती,
अब यह सरकार है।
जंतर मंतर पर बच्चों की
नहि,
सुनी चीत्कार पुकार है।।
युवा बेरोजगारों की लंबी लंबी,
सी लगती कतार है।
विकसित भारत का सपना ऐसे,
कैसे होगा साकार है।।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का,
नारा ऐसे होगा साकार है।
यदि आज भी बेटियों को
सहना,
पड़ रहा अत्याचार है।।
देश में खौफ अराजकता और,
असंतोष का बाजार है।
छात्रों पर क्रूर अत्याचार मेरी,
समझ से बिल्कुल पार है।।
जायज मांगों को मानिए श्रीमान,
यही मेरी दरकार है।
ऐसा ही असंतोष बढ़ता रहा,
तो खतरे में सरकार है।।
बच्चों की बात मान जाइए,
हम सबकी गुहार है।
बिना रोजगार और युवा शक्ति,
स्वप्न विश्व गुरु करता शर्मसार है।।
भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश













