
राम वल्लभ गुप्त इंदौर
नेह का पुष्प हूं, चंद दिन खिलूंगा
जितना दिन प्यार दोगे? जी लूंगा
ओ मेरी लताऐं एंव मित्र पल्लव
यह जीवन क्या है? क्षणिक गौरव
बीत चुका है अब मेरा सचिंत शैशव
अंत हो रहा है, मेरा सारा सारा वैभव
गमले में पल्लवित हुआ जब नव-नव
शीतल – मंद -सुगंध पवन था तब तब
खिलती थीं संग कलियाँ तब नव-नव
इठलाता था मेरा यह यौवन तब – तब
बाग झूमते थे तब – तब सुगंध – सौरव
तब मैंने कांटों का दर्द सहा हर संभव
जन्म मृत्यु चक्र है यह संसारिक भव
मगर कभी ना होगा मेरा रंच पराभव
पवन के साथ झूमता रहा मेरा सौरभ
किन्तु कांटे थे मेरे साथ जैसे कौरव
किंतु मै दृढ़ प्रतिज्ञ हूँ, पंच – पांडव
नहीं टूटूंगा करो प्रयत्न सारे संभव
राम वल्लभ गुप्त इंदौरी













