बर्फीली थीं वो चोटियां, पर हौसले अंगारे थे,
दुश्मन ने घेरा था ऊपर से, हमने हिम्मत से मारा था।
“विजय” का संकल्प लेकर निकले थे घर-आंगन से,
मां की बिंदी और तिरंगे की कसम साथ में बांधी थी।
कारगिल की हर चट्टान गवाह है आज भी,
कैसे 20 साल के जवान भी फौलाद बन गए थे।
बुलेट की बौछार में भी तिरंगा नहीं झुका,
क्योंकि उसमें 140 करोड़ की दुआएं बुनी थीं।
“सर कट सकता है, पर सर नहीं झुकेगा”
ये सिर्फ नारा नहीं, हर सैनिक का वचन था।
टाइगर हिल, टोलिंग, बटालिक गूंज उठे,
जब भारत माता के बेटों ने हुंकार भरी थी।
वो सर्द रातें, वो भूखे दिन, वो खून से लथपथ वर्दी,
हर घाव कहता था — “पीछे हटना मना है।”
ऑपरेशन विजय का हर पल इतिहास बना,
दुश्मन भी सलाम कर गया उनकी जांबाजी को।
चिट्ठियां आधी लिखी रह गईं, कंगन सूने रह गए,
पर उन्होंने वादा निभाया — “देश पहले”।
आज उनकी तस्वीरें स्कूलों में टंगी हैं,
ताकि हर बच्चा सीखे “देशभक्ति” का मतलब।
507 दीप बुझे, पर 1 अरब दिलों में उजाला हुआ,
आज भी उनकी शहादत से सरहद महफूज है।
घर में चूड़ियां इंतज़ार करती रहीं,
और वो चोटियों पर अमर हो गए।
आज 26 जुलाई है — कारगिल विजय दिवस,
उन वीरों को याद करने का दिन है।
शुक्रिया कहने का दिन है,
उन माओं को सलाम करने का दिन है।
वो सोए हैं बर्फ में, ताकि हम सोएं चैन से,
वो शहीद हुए, ताकि तिरंगा सदा शान से लहराए।
इसलिए गर्व से बोलो एक बार —
जय हिंद! जय भारत!
— कारगिल के अमर शहीदों को समर्पित
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













