
दर्पण जब पाषाणों के साथ साथ रहें,
उन दोनो में मित्रता भी गहरी होती है,
दोनो नहीं सोचते आपस में टकराने की,
तब कोई बात नही होती है घबराने की।
सम्बंध नहीं होते केवल सम्बंध बनाने से,
सम्बंध होते हैं सुदृढ़ सदैव निभाने से,
स्वारथ के रिश्ते कुछ दिन चल पाते हैं,
दिल से बने रिश्ते आजीवन निभ जाते हैं।
समय किसी का इंतजार नहीं करता है,
वह तो अपनी गति से चलता रहता है,
सही समय का इंतजार क्यों करना है,
वर्तमान का ही सही सदुपयोग करना है।
जो समय आज चल रहा है वह समय ही,
सबसे बेहतर, वही समय अच्छा होता है,
ऊंचे आसन पे बैठा कोई श्रेष्ठ नहीं होता है,
यह उसकी ऊँची सोच पर निर्भर करता है।
जब समय बुरा होता है तभी दिलासा
देने वाला भी जीवन में परखा जाता है,
वह चाहे कोई अजनबी ही क्यों न हो,
हमारे दिल में वह ही घर कर जाता है।
बुरे समय में किनारा कर लेने वाला,
पर चाहे कोई अपना ही क्यों नही हो,
वह दिल से सदा के लिये उतर जाता है,
उसका स्वार्थ सदा उसके आड़ें आता है।
जिसकी समय पर उपस्थिति से ही कोई,
व्यक्ति स्वयं के सारे दुःख भूल जाए,
यही उसकी उपस्थिति की सार्थकता है,
आदित्य सोच साथ देने की सज्जनता है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













