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मन संन्यासी हो गया

मन संन्यासी हो गया, बदल गई हर राह,
सूनी आँखों में बस गई, प्रभु दर्शन की चाह।
जिनको अपना मान लिया, वे सब छूटे साथ,
तब जाकर खुलने लगी, सत्य-प्रेम की बात॥

टूट गए जब स्वप्न सब, बिखर गए अरमान,
तब मन ने पहचान लिया, जीवन का सच जान।
आँसू बनकर बह गई, मन की सारी पीर,
हृदय-दीप में आ बसे, मेरे सद्गुरु वीर॥

अब न कोई चाह रही, अब न कोई आस,
नाम तुम्हारा बन गया, मेरी हर इक श्वास।
भीड़ भरे इस जगत में, मन कितना था अकेला,
चरण तुम्हारे मिल गए, जीवन हुआ सुहेला॥

धन-दौलत सब धूल है, झूठा मान-सम्मान,
सच्चा केवल प्रेम है, सच्चा तेरा ध्यान।
दुनिया ने जो घाव दिए, तुमने उन्हें सहलाया,
टूटे मन के हर टुकड़े को, प्रेम से फिर मिलाया॥

जब-जब मन थकने लगा, तुमने दिया सहारा,
अँधियारे हर मोड़ पर, बनकर दीपक तारा।
तेरी करुणा की छाँव में, मिट गए सब क्लेश,
रोता मन भी गुनगुनाने लगा, पाकर तेरा देश॥

मोह-माया के बंधन सब, धीरे-धीरे टूटे,
अहंकार के ऊँचे पर्वत, चरणों में आ छूटे।
सुख-दुःख दोनों एक से, जग का यही विधान,
जो कुछ पाया, खो गया—शेष रहा भगवान॥

मन संन्यासी हो गया, जग से रूठा नहीं,
हर प्राणी में अब दिखे, तुम बिन दूजा नहीं।
‘मैं’ का दीप बुझ ही गया, ‘तू’ का हुआ प्रकाश,
जीते जी ही मिल गया, प्रभु चरणों का वास॥

नहीं विरक्ति भागना, नहीं जगत से बैर,
सेवा, करुणा, प्रेम ही, संन्यासी का गहना फेर।
मन मंदिर में गूँजता, बस तेरा ही नाम,
यही मोक्ष, यही मुक्ति है, यही परम विश्राम॥

योगेश गहतोड़ी “यश”

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