
गुरु की कृपा अनमोल रतन,
जिसे मिले वह धन्य बने,
भटक रहे जो अज्ञान में,
वो भी पथिक सहज तन्य बने॥
गुरु वो दीपक, जो जल कर,
औरों को आलोक दे,
स्वयं तपे वह हर पल लेकिन,
शिष्य को सुख-संदेश दे॥
गुरु की वाणी अमृत जैसी,
मन को निर्मल कर जाए,
जिनके चरणों में शीश झुके,
उसका भाग्य खिल जाए॥
गुरु बिना नहीं गति मिलती,
ना जीवन का सार मिले,
उनकी कृपा से ही जग में,
सच्चा सत्कार मिले॥
जिसने गुरु को जान लिया,
उसने सब कुछ जान लिया,
गुरु कृपा जो पा जाए,
उसने भगवान को मान लिया॥
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













