
चुप्पी सिर्फ़ ख़ामोशी नहीं होती,
कभी-कभी यह सबसे ऊँचा शोर होती है।
जिसे कान नहीं सुन पाते,
उसे संवेदनशील दिल महसूस करता है।
मुझे याद है अपना बचपन,
गाँव की पगडंडियाँ, धूल भरे रास्ते,
आम की छाँव, तालाब का पानी,
और बच्चों की बेफ़िक्र हँसी।
वहाँ न कोई छोटा था, न बड़ा,
न लड़का, न लड़की—
बस बचपन था,
जो हर साँस में मुस्कुराता था।
फिर अचानक किसी आँगन से
एक आवाज़ आती थी—
“कम हँसा कर…”
“धीरे बोला कर…”
“लड़कों के साथ कम खेला कर…”
“एक दिन दूसरे घर जाना है,
अभी से सीख ले…”
मैं सोचता था—
क्या हँसी भी गुनाह होती है?
क्या सपनों पर भी पहरे होते हैं?
क्या बेटी होना
इतना बड़ा अपराध होता है?
मुझे लगता था—
शायद माँ ही उसकी उड़ान रोक रही है।
मगर समय ने
मेरी सोच बदल दी।
समझ आया—
वह बेटी की दुश्मन नहीं थी,
वह उस दुनिया से डरती थी
जिसने उसके अपने सपनों को
कभी पूरा होने ही नहीं दिया।
उसकी डाँट में नफ़रत नहीं,
अनुभव था।
उसकी सख़्ती में कठोरता नहीं,
टूटे हुए वर्षों की थकान थी।
वह जानती थी—
समाज अक्सर बेटियों को
कदमों से नहीं,
नज़रों से तौलता है।
उनकी हँसी का हिसाब रखता है,
उनकी ख़ामोशी का भी अर्थ निकालता है।
इसलिए वह
बेटी को बदलना नहीं चाहती थी,
बस उसे टूटने से बचाना चाहती थी।
तब जाना—
कुछ चुप्पियाँ
अधूरे सपनों की कब्र होती हैं।
कुछ चुप्पियाँ
मजबूरियों की चीख होती हैं।
कुछ चुप्पियाँ
माँ की आँखों से बहती हैं,
पर आँसू बनकर नहीं।
आज भी
जब कोई माँ अपनी बेटी से कहती है—
“कम हँसा कर…”
तो मुझे उसकी आवाज़ में
डाँट नहीं सुनाई देती।
मुझे सुनाई देता है
सदियों का डर…
अनगिनत औरतों का दर्द…
और उन सपनों का शोर,
जो कभी शब्द नहीं बन सके।
तभी महसूस होता है—
चुप्पी सिर्फ़ ख़ामोशी नहीं होती,
चुप्पी कभी-कभी
इतना गहरा शोर होती है
कि उसे सुनने के लिए
कान नहीं,
एक संवेदनशील हृदय चाहिए।
आर एस लॉस्टम













