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गुरु वंदना

देखो बिन बाती बिन तेल के मैं एक ज्योत जलाएं रहता हूं,

तन के अंदर अंधेरा कमरे में रहता है ,

फिर भी आठों पहर उजियारा है,

ऐसा साहिब गुरु देव हमारा है ।

किराए दार हम सब इस कमरे के,
कमरे में कचरों का अंम्बार ढेर सारा है,

बिन झाड़ू से हि साफ करें सब गंदगी को साहिब,

तब कहीं घर आंगन साफ हमारा है,

घर आंगन में धुप खिलाई, नया सूरज ज़मीं पर लाएं हैं , उम्मीदों पर हर परिक्षाओं में खरा उतरना है ,
गुरु देव का आशिश लेंते रहने में ही,

जीवन में हर तरफ ज्ञान का उजियारा है।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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