
जो सही गलत की पहचान बताते ,
वहीं हमारे गुरू कहलाते।
विनम्रता का पाठ हमें सीखाते ,
जिंदगी जीने के काबिल बनाते।
हर विपरित परिस्थितियों में भी,
विचलित न होने की,
हिम्मत जो हम सभी में जगाते।
वहीं हमारे गुरू कहलाते |
सोने की भांति हमें तपाते |
सारी दुनियां में हमें सम्मान जो दिलाते।
संयम की परिभाषा हमें बतलाते |
तभी तो हर कठिनाइयों से हम पार है पाते |
वहीं हमारे गुरू कहलाते |
अध्यात्म के रास्ते हमें चलाते |
तभी ईश्वर को हम जान पाते |
ऐसे ही गुरू के सामने हम शीश झुकाते |
इसीलिए माता-पिता सबसे पहले,
मंजू के लिए गुरू की श्रेणी में आते |
उनके कारण ही तो हम इस दुनियां में जो आते |
तभी तो हम सबसे है मिल पाते |
ऐसे ‘सच्चे गुरू’ के सामने हम सदैव ही शीश झुकाते ||
मंजू अशोक राजाभोज
भंडारा (महाराष्ट्र)













