
मैं विरह के दर्द में यूँ डूबा रहा,
अंधेरों में तुझको ढूंढता रहा,
तेरा साथ पाकर हे प्रभु, मेरा
जीवन ये अब धन्य हो गया॥
तेरा साथ पाकर… ॥
कितनी रातें तड़प-तड़प बीतीं,
आँसुओं से तेरी राहें सींचीं।
तू दूर था तो सांसें भारी थी,
तेरे बिन दुनिया अंधियारी थी॥
आज तेरी एक झलक पाकर,
जन्मों बंधन से मुक्त हो गया॥
तेरा साथ पाकर…॥
न मांगा महल, नही मांगी दौलत,
न मांगी कोई और नियामत।
तेरे चरणों की धूल ही काफी है,
तेरे नाम की मस्ती ही काफी है॥
‘मैं’ मेरा मिट गया, ‘तू’ बचा है,
हर साँस में बस तेरा नाम है॥
तेरा साथ पाकर… ॥
अब न कोई ग़म, न कोई फ़रियाद,
तेरा सानिध्य ही है मेरी सौगात।
काँटों की सेज भी फूल लगती है,
तेरी याद में ये देह झूलती है॥
विठ्ठल हुआ तन, हरि-मय मन,
भव-सागर से बेड़ा तर गया॥
तेरा साथ पाकर हे प्रभु,
मेरा जीवन ये अब धन्य हो गया॥
तेरा साथ पाकर… ॥
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ











