
गुरू की शरण लीजिए, तूं जो चाहे ज्ञान।
गुरू ज्ञान का मूल है, जाने नर अंजान।।
गुरू जी प्रभु से है बड़े, कहे स्वयं भगवान।
गुरु जोड़े भगवान से, गुरू कृपा अति मान।।
गुरु बिना ज्ञान नही है, कहते ज्ञानी लोग।
जग तो कंटक धूल हैं, जहा मिले दुख रोग।।
गुरू जिनसे ज्ञान मिला, वंदन उनको बारंबार।।
मनोहर शरण में रखिए, विनय करें स्वीकार।।
मुड़ मति है शिष्य आपका,दीजिए मुझ पर ध्यान।
कुछ अंश गुरू ज्ञान का, करे मुझे भी दान।।
गीतकार मनोहर मधुकर











