
रिमझिम फुहारों का मौसम आया,
अब जाकर तुमने मेरे आँगन में भी फूल बरसाए हैं।
उत्सव भी बीत गया, पतझड़ भी चला गया,
तुम्हारी राह तकते-तकते मेरे आँगन के पेड़ भी थक गए हैं।
आज तुम्हें यूँ सामने देखकर
मन की हर सूनी डाली फिर से महक उठी है।
गगन ने भी धरा को बाहों में भर लिया,
तालाब के कमल भी मुस्कुराने लगे हैं,
जैसे बरखा ने हर दिल को प्रेम करना सिखा दिया हो।
तुम जो मेरी आँखों में झाँकोगे,
तो पलकों के नीचे ठहरे काले बादलों को पढ़ लोगे।
मेरी बिंदिया, मेरे कंगन—
मेरे विरह के मौन साक्षी हैं।
जिसकी पूरी दुनिया तुम हो साजन,
उसे फिर यूँ तन्हा छोड़ मत जाना।
मुझे फिर से विरहन नहीं बनना,
मुझे तो तुम्हारे पसंद का भोजन बनाना है,
रोज़ तुम्हारे साथ चाय की चुस्कियों में
ज़िंदगी के छोटे-छोटे सुख सजाने हैं।
तुम्हारे कपड़े प्रेस करने हैं,
तुम्हारे बालों में रंग नहीं,
अपने प्रेम का स्पर्श भरना है।
अब जब लौट ही आए हो,
तो इस बार मुझे अपने साथ ले चलना।
फिर कभी विरह की उस लंबी रात में
मुझे अकेला छोड़ मत जाना…
क्योंकि मेरा हर मौसम
तुमसे ही शुरू होता है,
और तुम पर ही आकर ठहर जाता है।
ज्योति बरनवाल, नवादा (बिहार)













