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समय (कहानी)

दिल्ली शहर की ऊँची इमारतों के बीच रहने वाला अभिषेक एक प्रतिष्ठित कंपनी में कार्यरत था। सुबह से देर रात तक बैठकों, मोबाइल और लैपटॉप में उलझा रहने वाला वह व्यक्ति सफलता को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानता था। उसके माता-पिता गाँव में रहते थे और कई महीनों से उसके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। पत्नी और पुत्र भी चाहते थे कि वह कुछ समय उनके साथ बिताए, पर हर बार उसका उत्तर एक ही होता— “अभी समय नहीं है।” उसे लगता था कि धन और पद ही भविष्य को सुरक्षित बना देंगे, इसलिए वर्तमान के रिश्तों को वह अनजाने में पीछे छोड़ता जा रहा था।

एक दिन कार्यालय में कार्य करते समय अभिषेक को सूचना मिली कि उसके पिता जी अचानक गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं। वह तुरंत गाँव पहुँचा, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पिता अंतिम साँस लेने से पहले उसके पिताजी बोले “बेटा, समय निकाल लिया होता तो आज यह दूरी नहीं रहती।” यह सुनते ही अभिषेक का मन अपराधबोध से भर गया। उसने महसूस किया कि वर्षों तक जिस सफलता के पीछे वह भागता रहा, उसने उसे अपने सबसे प्रिय संबंधों से दूर कर दिया। उस रात उसे पहली बार समझ आया कि समय किसी का इंतजार नहीं करता।

पिता के निधन के बाद अभिषेक ने अपने जीवन को नए दृष्टिकोण से देखना शुरू किया। उसने पाया कि आज का समाज भी उसी दौड़ में शामिल है जहाँ लोग मोबाइल पर हजारों लोगों से जुड़े हैं, लेकिन अपने परिवार से दूर होते जा रहे हैं। बच्चे माता-पिता के साथ बैठने के बजाय मोबाईल स्क्रीन पर व्यस्त रहते हैं और बड़े लोग काम के दबाव में अपनों के लिए समय नहीं निकाल पाते। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन आत्मीयता घटती जा रही है। अभिषेक ने निश्चय किया कि वह केवल धन कमाने के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों को संजोने के लिए भी जीवन जिएगा।

धीरे-धीरे उसने अपने जीवन की प्राथमिकताएँ बदल दीं। कार्यालय के निश्चित समय के बाद वह परिवार के साथ बैठने लगा, माँ को अपने पास ले आया और सप्ताह में एक दिन सामाजिक सेवा के लिए निर्धारित किया। उसने अपने मित्रों से भी कहा कि सफलता का अर्थ केवल ऊँचा वेतन नहीं, बल्कि अपने प्रियजनों के चेहरे पर मुस्कान लाना भी है। उसके इस परिवर्तन से परिवार में फिर से हँसी लौट आई। माँ की आँखों में संतोष था और पुत्र को पहली बार अपने पिता का स्नेह और साथ भरपूर मिलने लगा।

कुछ वर्षों बाद अभिषेक ने अपने बच्चे के विद्यालय में वार्षिक समारोह में बच्चों को संबोधित करते हुए कहा, “समय संसार की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। खोया हुआ धन वापस मिल सकता है, पर बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता।” उसकी बात सुनकर सभी विद्यार्थी और अभिभावक गहरे विचार में डूब गए। कहानी का संदेश स्पष्ट था कि वर्तमान युग की सबसे बड़ी चुनौती समय का अभाव नहीं, बल्कि समय की गलत प्राथमिकताएँ हैं। जो व्यक्ति समय का सम्मान करता है, वही रिश्तों, कर्तव्यों और जीवन की वास्तविक खुशियों को सहेजकर सच्ची सफलता प्राप्त करता है।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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