
मौन इसलिए
मुस्कान लिए खड़ा है,
मुस्कुराहट,, किसी और के हक का किरदार बन कर रह गई है,
मुखोटे
मुंह से असली वाणी कहां बोलते हैं ,
नज़र आता नहीं मुझे किसी का असली चेहरा ,
छिपा हुआ है
इसके पीछे राज गहरा,
जो काबिले तारीफ है और किसी जगह पर मशगूल हैं,
एक मुकाम हांसिल करने में सक्षम है आप
सफर ए मोहब्बत में
बिताता जाएगा हमारा जीवन भी,
मगर पिछले समय में
तुमने कभी पुकार कर याद किया था जिन्हें,
जनाब लौटकर उन लोगों को सुकून दिया करें,
जो एतबार के काबिल हैं, निगाहें करम पर,
हमारा विश्वास हि है जो किसी को निभाना सिखाते हैं हम यहां जहां में
वरना कभी भी किसी का तुम्हारे बिना काम रुका नहीं है,,,
आ आ अब लौट चलें
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)











