
मैं मुसाफिर तेरे उर का
रोक ना राह मेरा,मुझे सफर का
मंजिल तक हर हाल मे पहुँचना है ,
तेरे मन मंदीर मे,अब मुझे बसना है ।
मुझे अब मन नही लगता है,तेरे बिना,
साथ साथ है,अब मुझे तुझसे रहना,
जीवन की सुख दुख की है,बाते करना,
मिलकर तुझ संग है,नया संसार बसाना ।
बहुत भागमभाग हो चुकी, ये जिदगी की,
अब थकने लगा हूं, खुद मे ही खुद की,
विश्राम करने का,अब मन है मचलता,
ये दिल,अब तुझको ही है चाहता ।
तुम भी, अब रूक ही जाओ ना ?
मेरे संग संग जिदगी बिताने का सोचो ना?
मुसाफिर बनकर आया हूं, तेरे पास,
तेरे ही उर मे रहना है,करो मेरा विश्वास ।
चुनू साहा पाकुड़ झारखंड











