प्रेम विवाह, बालिग बेटियाँ और माता-पिता के अधिकार : बदलते समाज में संतुलन की आवश्यकता

हाल ही में मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले में हुई विचित्र घटना ने मेरे अंतर्मन को झकझोर दिया। जहां माता पिता की अनुमति के बिना प्रेम विवाह के बाद परिजनों ने बेटी को मृत मानते हुए उसका अंतिम संस्कार कर दिया। 19 वर्षीय, कॉलेज फर्स्ट ईयर की छात्रा घर से लापता हो गई थी। परिवार ने थाने में रिपोर्ट लिखाई। पुलिस ने उसे ढूंढा तो पता चला कि उसने अपनी मर्जी से दूसरे समाज के लड़के से शादी कर ली है और बालिग होने के कारण लड़के के साथ रहने की बात कही। इसी नाराजगी में परिवार ने समाज की मर्यादा का हवाला देकर बेटी से नाता तोड़ते हुए उसका तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान कर दिया। माता पिता ने जिस बेटी को 19 साल तक पाल पोश कर बड़ा किया वह कुछ दिन के प्यार में पागल होकर घर परिवार छोड़कर चली गई। इस बात से वे बहुत व्यथित थे। दुर्भाग्य पूर्ण तो ये भी है कि 18 वर्ष का होने के बाद कानूनी रूप से माता पिता का कोई अधिकार नहीं रहता। माता पिता इस बात से भी बहुत परेशान थे। ये कोई इकलौता केस नहीं है। बिहार के मुजफ्फरपुर में भी इसी तरह दूसरी जाति में लव मैरिज करने पर परिवार ने बेटी की प्रतीकात्मक अर्थी निकालकर दाह संस्कार किया था। समाज में ऐसी खबरें बार-बार वायरल होती रहती हैं। अब प्रश्न उठता है कि लड़कियों के अठारह वर्ष की उम्र के बाद संवेग में आकर प्रेम विवाह करना कितना सही है और क्या अठारह वर्ष के बाद माता पिता का बच्चों पर अधिकार समाप्त हो जाता है। भारत जैसे सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों वाले देश में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में प्रेम विवाहों की संख्या बढ़ी है। शिक्षा, सोशल मीडिया, मोबाइल फोन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता ने युवाओं को अपने जीवनसाथी चुनने का अवसर दिया है। दूसरी ओर अनेक ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें कम उम्र में भावनात्मक आवेग, छल-कपट, झूठी पहचान, आर्थिक लालच, धर्म या पहचान छिपाकर संबंध बनाना, मानव तस्करी, घरेलू हिंसा तथा यौन अपराध जैसी घटनाओं ने समाज को चिंतित किया है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि 18 वर्ष की आयु के बाद बेटी कानूनी रूप से बालिग हो जाती है, तो क्या माता-पिता की भूमिका और अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाने चाहिए?
भारतीय कानून के अनुसार 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाली महिला बालिग मानी जाती है और उसे अपनी इच्छा से विवाह करने तथा जीवन के निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। इसलिए यदि दो बालिग व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से विवाह करना चाहते हैं, तो कानून सामान्यतः उनके निर्णय का सम्मान करता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है। किन्तु केवल कानूनी बालिग होना हमेशा मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक परिपक्वता का प्रमाण नहीं होता। 18–20 वर्ष की आयु में अनेक युवा जीवन के अनुभवों से अभी पूरी तरह परिचित नहीं होते। आकर्षण, भावनात्मक दबाव, सोशल मीडिया का प्रभाव, झूठे वादे या भविष्य के सुनहरे सपने कभी-कभी विवेक पूर्ण निर्णय लेने में बाधा बन जाते हैं। ऐसे में माता-पिता की चिंता केवल परंपरा या सामाजिक प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं होती, बल्कि अपनी संतान की सुरक्षा और भविष्य भी उनके लिए महत्वपूर्ण होता है।
आज अनेक मामले सामने आते हैं जिनमें प्रेम संबंधों के नाम पर धोखा, आर्थिक शोषण, पहचान छिपाना, विवाह के बाद हिंसा, मानव तस्करी या अन्य अपराध देखने को मिलते हैं। हालांकि यह भी सत्य है कि ऐसी घटनाए केवल प्रेम विवाहों तक सीमित नहीं हैं। कई पारंपरिक या परिवार द्वारा तय किए गए विवाहों में भी दहेज, हिंसा और उत्पीड़न जैसी समस्याए देखने को मिलती है।
ऐसी परिस्थितियों में माता-पिता स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। यदि उनकी बालिग बेटी अपनी इच्छा से विवाह करना चाहती है, तो वे उसे कानूनी रूप से रोक नहीं सकते। यदि वे बलपूर्वक रोकने का प्रयास करें, तो यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन माना जा सकता है। इसलिए कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता और परिवार की चिंता के बीच एक कठिन संतुलन बनाने का प्रयास करता है।
इस विषय पर यदि किसी विवाह में धोखाधड़ी, झूठी पहचान, जबरदस्ती, धमकी या मानव तस्करी का संदेह हो, तो उसकी निष्पक्ष और त्वरित जांच की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि यदि वास्तविक खतरे के संकेत हों तो समय रहते उचित कार्रवाई की जा सके। इसके साथ ही युवाओं को विद्यालयों और महाविद्यालयों में यह बताया जाना चाहिए कि ऑन लाइन मित्रता, फर्जी पहचान, आर्थिक धोखाधड़ी और भावनात्मक शोषण से कैसे बचा जाए। यदि युवा सही जानकारी और विवेक के साथ निर्णय लें, तो वे गलत संबंधों से बच सकते हैं। इसमें समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। जाति, धर्म या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर हर प्रेम विवाह का विरोध करना उचित नहीं है। माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद का अभाव भी अनेक समस्याओं का कारण बनता है। यदि परिवार में विश्वास, खुलापन और सम्मानपूर्ण बातचीत हो, तो बच्चे अपने संबंधों और निर्णयों के बारे में पहले ही अपने माता-पिता से चर्चा कर सकते हैं। इससे गलत फहमियाँ कम होंगी और जोखिमपूर्ण परिस्थितियों की पहचान भी समय रहते हो सकेगी। अंत में यह कहना उचित होगा कि बालिग होने के बाद बेटा बेटी के कानूनी अधिकार है माता-पिता के प्रेम, अनुभव और नैतिक दायित्व को महत्व देना होगा।
भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश











