
31 जुलाई अठारह सौ अस्सी,
लमही गाँव में जन्मी एक ज्योती।
धनपतराय नाम, दुनिया ने कहा,
प्रेमचंद हिंदी का सच्चा मोती॥
पिता मुंशी अजायबलाल, डाकखाने में 20 की नौकरी,
माँ आनंदी देवी, आँचल में
आशीष के कूप।
किसानी न चली तो
स्याही से किसानी की,
गरीबी देखी, दर्द को
शब्दों में बानी की॥
300 कहानियाँ, 300 आईने,
गरीब की रोटी, अमीर की आहें।
कफन में ठंड, ईदगाह में चिमटा,
पूस की रात में काँपता हलवाहा॥
दो बैलों की कथा में दोस्ती बोली,
पंच परमेश्वर में इंसाफ की टोली।
नमक का दरोगा ने ईमान सिखाया,
बूढ़ी काकी ने रिश्तों का मान बताया॥
बड़े घर की बेटी, ठाकुर का कुआँ,
सवा सेर गेहूँ में कर्ज़ का कुआँ।
मंत्र में अंधविश्वास टूटा,
बड़े भाई साहब में अनुशासन छूटा।
आत्माराम ने कहा – सच से मत भागो॥
और उपन्यास, वो तो एक युग थे।
सेवासदन में नारी की पीड़ा,
गबन में लालच की सीढ़ी,
गोदान में होरी की आखिरी ईच्छा,
एक गाय, बस एक गाय,
और टूट गई इच्छा॥
उनका पूरा जीवन,
संघर्ष का आवरण,
कलम से निकली कहानी,
हिंदी का वंदन।
8 अक्टूबर 1936,
वाराणसी में दीप बुझा,
56 बसंत जिए, पर
साहित्य अमर कर गया॥
आदित्य प्रेमचंद मरे नहीं,
आज भी लिखते हैं,
हर किसान की आँख में,
हर मजदूर की पीड़ा में।
जब कोई “हाथ बढ़ाने”
की बात करता है,
तो समझो प्रेमचंद की
कोई कहानी ज़िंदा है॥
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ ‘विद्यासागर’, लखनऊ













