
लमही के पावन आँगन से, जो बना लेखनी का अवतार,
‘गोदान’ और ‘ग़बन’ की गाथा, से महकाया साहित्य-संसार।।
शोषित-पीड़ित के सजल नयन, जिसमें पाते पावन-विराम,
हिंदी-साहित्य गगन का वह, चमका प्रेमचंद बन नाम।
‘सेवासदन’ और ‘रंगभूमि’, जिसने मानस के पट खोले,
युग-वाणी का वह कड़वा सच, जो प्रगति-पंथ पर दृढ़ बोले।
तज कर रूढ़िवादी धारा, जो बढ़ा चेतना के पार कहीं,
यथार्थवाद की आभा-सी, प्रखर छवि दूजी और नही।
‘ग़रीब’ और ‘होरी’ के दुःख को, जिसने शब्दों में ढाला था,
‘हल्कू’ की उस सर्द रात का, हर इक दर्द सँभाला था।
‘निर्मला’ का क्रंदन देखा, ‘ईदगाह’ का वो अनुपम प्यार,
कलम का वह सच्चा सिपाही, पाया जन-जन का अमिट प्यार।
‘मानसरोवर’ की कथाओं में, गाया माटी का रूप-अपार,
उस युगद्रष्टा के अमर स्वर को, नमन करे यह जग-संसार।
पुष्प-सुमन अर्पित कर आज, करते हैं हम सादर प्रणाम,
ओ शब्द-शिल्पी! सुर-समाज में, गूँजेगा तेरा अमर नाम।
“कलम के ऐसे सच्चे सिपाही, मुंशी प्रेमचंद जी को मेरा कोटि-कोटि नमन। धन्यवाद! जय हिन्द, जय हिंदी!”
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश












