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प्रेमचंद: कलम के योद्धा

न सिंहासन, न राज मुकुट

न वैभव की चाह,

हाथों में बस एक कलम थी,

जिसने हर मन इतिहास लिखा ।

उन्होंने महलों की गीत नहीं,

झोपड़ी की धड़कन लिखी ।

वह शब्द नहीं युग का स्पंदन थे,

हर पीड़ा के मौन बंधन थे ।

अन्याय और अत्याचार पर,

निर्भय होकर लिखते थे।

उनके लेखनी में खेत महकते थे,

और हल की धुन गुनगुनाती थी ।

होरी की थकी हथेलियां में,

पूरे भारत की कहानी थी ।

वह भूख की रोटी नही,

रोटी का अधिकार लिखते थे ।

वह लेखक नहीं,

एक चेतना थे ।

अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाले,

वह देश के वीर योद्धा थे ।

प्रेमचंद केवल लेखक नहीं,

भारत की आत्मा के शब्दकोष थे ।

जब-जब सच्च पर पहरें होंगे,

मानवता रोएगी ।

तब तब उनकी अमर लेखनी,

नई सुबह बनकर आएगी ।…


पूनम कुमारी
मधुबनी बिहार

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