
लकीरों में बँटी हुई ज़िंदगी,
कोनों में बिखरे हुए ख़्वाब।
हर आकार कुछ कहता है,
हर साया खोलता है एक नया हिसाब।
बीचों-बीच बैठी एक ख़ामोश रूह,
आँखें मूँदकर खुद को टटोल रही है।
बाहर जितना शोर दिखाई देता है,
भीतर उतनी ही ख़ामोशी बोल रही है।
ये त्रिकोण, ये वृत्त, ये टूटी हुई रेखाएँ,
सिर्फ़ आकृतियाँ नहीं, एहसास हैं।
कहीं उम्मीद की रोशनी छिपी है,
तो कहीं अधूरे अरमानों की प्यास है।
ज़िंदगी भी तो ऐसी ही होती है,
सीधी राह कभी मिलती नहीं।
हर मोड़ पर बदल जाती है तस्वीर,
कोई मंज़िल हमेशा दिखती नहीं।
फिर भी इंसान मुस्कुराता है,
टूटकर भी हर रोज़ सँवर जाता है।
शायद इसी का नाम ज़िंदगी है,
जो बिखरकर भी निखर जाती है।
आर एस लॉस्टम













