
नभ पर छाईं श्यामल घनघोर घटाएं,
अवनि पुलकित देखो हर्षित चहुं ओर दिशाएं ।
छम छम छम मेघ बरसते सखी धरती पर,
रिमझिम रिमझिम क्या कहते हैं बूंदों के स्वर।
सखी,सावन घन कड़क रही बिजुरिया,
जाने अंतस में ये कैसी हूक उठी।
जलाती हैं टिप-टिप वर्षा की बूंदे,
प्यासे इस हिय को तड़पाती हैं बड़ी।
चातक, मोर, पपीहे, दादुर सबके,
स्वर नहीं अब मोहें रिझाये।
देखो, हरित ओढ़नी ओढ़े है धरती,
फिर भी अंतर्मन मेरा सूखा जाए
बहती मदमाती चंचल शोख हवाएं
देखो तरु शाखाएं आलिंगन करती।
छेड़ती हैं प्रेम राग देखो सखी,
मेरे सूने मन में यह नेह भरती।
कह दो इन चंचल वर्षा की बूंदों से,
अब के मोहे ना ही भिगोए।
बिन साजन भाए ना कुछ भी,
मेरे साजन को लेकर वापस आए।
उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)












