
सावन की पहली बूँद गिरी,
धरती ने श्रृंगार किया,
हर पत्ता “हर-हर” गाने लगा,
अंबर ने अभिषेक किया।
घन-घन करती काली घटा,
जैसे डमरू बजता हो,
हर बिजली की चमक में मानो,
भोले का त्रिशूल सजता हो।
बेलपत्रों की कोमल खुशबू
,गंगाजल का पावन नीर,
श्रद्धा से जो शीश झुकाए,
भर दें शंकर उसकी पीर।
जब जीवन की राह कठिन हो
,जब टूटे मन का विश्वास भोले!
तुम ही थाम लेना,
दे देना अपना साथ।
सावन केवल ऋतु नहीं है,
मन का निर्मल उत्सव है,
जो शिव में स्वयं को खो देता,
उसका जीवन ही शिवमय है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र












