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हरि का हार सम्हार

हरि का हार सम्हार रे बंदे ,
हरि का हार सम्हार ।
नहीं हार ये बारंबार रे बंदे ,
हरि का हार सम्हार ।।
अंग अंग में गंग समाहित ,
जीवन भरा हुआ है जंग ।
जीवन सदा दुःख भरा है ,
फिर करते क्यूॅं हो तंग ।।
मत बहो तीव्र धार रे बंदे ,
मत बहो तीव्र धार ।
नहीं हार बारंबार रे बंदे ,
हरि का हार सम्हार ।।
हरि हार हरियाली नहीं है ,
सोए पड़े तेरे हर घास ।
ईश को तुझसे आस लगी ,
बनकर रहे धन के दास ।।
हरि से हार का तार रे बंदे ,
हरि से हार का तार ।
नहीं हार बारंबार रे बंदे ,
हरि का हार सम्हार ।।

शब्दार्थ : हार = तन शरीर , सम्हार = संभालना , घास = रोम


अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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